रविवार, 27 मई 2018

मैं अपना प्यार - 28




*Non caret effectu, quod volere duo (Latin): यदि दो व्‍यक्ति कुछ करने की ठान लें, तो उन्‍हें कोई नहीं रोक सकता – ओविद 43 BCAD C 17
अट्ठाईसवाँ दिन
फरवरी ७,१९८२

एक महीने की जुदाई मानो जीवन भर की जुदाई हो। मुझसे न पूछोकि मुझे तुम्‍हारी कितनी याद आई। मुझसे न पूछो कि मैं तुमसे कितना प्‍यार करता हूँ। मैं सिर्फ इतना कह सकता हूँ  कि तुम मेरे लिये सब कुछ हो और मेरा सब कुछ तुम्‍हीं हो। क्‍या यह पर्याप्‍त है? ये मेरी आज की चेतना का आरंभ है।
और अब मेरी खोजों की दुनिया में चलूँ:
सुबह मुझे हल्‍का-सा जुकाम था। बाहर निकलने के बदले मैंने दवा की एक गोली खाई और घंटा भर बिस्‍तर पर आराम किया। इसके बाद मुझे कुछ अच्छा लगा। २ बजे मैं फिर से पुस्‍तक मेले में गया। इस बार मेरा इरादा एम०एल० मानिच जुम्‍साइ्र की मदद करना था, उनके किसी काम आ सकता! यह हुई एक बात, दूसरी यह कि किताबों में प्रदर्शित ज्ञान की दुनिया में थोडा़ टहल आऊँ। मेरे पास दो रूपये थे। मगर यह कोई समस्‍या नहीं थी, क्‍योंकि मैंने कोई किताब खरीदी ही नहीं। किताब का मूल्‍य चुकाए बिना भी मैं उसमें से कुछ न कुछ हासिल कर सकता हूँ।
बेशक मैं ‘‘कुछ भी नहीं’’ से ‘‘कुछ’’ बनाने की कोशिश कर रहा था। यह संभव है और मैंने यह किया भी। बस ने मेरे साथ मजा़क ही किया। वह दूसरे रास्‍ते से गई और मुझे कहीं और ले गई। मैंने उतरने की कोशिश की, इससे पहले कि बस मुझे बहुत दूर ले जाये, मगर कोई फायदा नहीं हुआ, ड्राइवर ने मेरी मिन्‍नत पर ध्‍यान ही नहीं दिया। मैं महारानी बाग पर उतरा और दूसरी बस पकड़ कर पुस्‍तक मेला पहुँचा। बस खचाखच भरी थी। मुझे कोहनियों से भीड़ में से होकर अपने लिये रास्‍ता बनाना पडा़, ताकि मैं उतर सकॅू। दूसरे यात्री चीख रहे थे और कंधों से धक्‍के मारते हुए रास्‍ता बना रहे थे। ये बडा़ दर्दनाक एहसास है, मजा़ भी आता है। नीचे उन देशों के नाम दे रहा हूँ जहाँ मैं आज किताबें देखने गयाः
थाईलैण्‍ड - हर चीज वैसी ही है, जैसी कल थी। एम०एल० मानिच जुम्‍साई अभी तक आए नहीं थे। मैं देर तक उनका इंतजार नहीं कर सकता था। मैं अन्‍य स्‍टॉलो की ओर गया, इस बात का ध्‍यान रखते हुए कि मैं थाईलैण्‍ड वापस आऊँगा। फिर मैं आया भी।
बांग्‍लादेश – यहाँ बस एक किताब मुझे अच्‍छी लगी। इसका शीर्षक है ‘‘बांग्लादेश के युवा कवि’’। मैंने पन्‍ने उलट पलट कर देखा तो एक कविता दिखाइ्र दी, जो काफी काल्‍पनिक थी। ये है वह कविताः
नग्‍न चन्‍द्रमा
देखा शशि* को कपड़े उतारते,
उसने अपनी कंचुकी और साया हटाया,
खुशबू, जिसे चांदनी रात कहते हैं,
उसके शरीर से फिसल गई।
जब मैंने उस पवित्र नग्‍न चन्‍द्रमा को
अपनी पिछली जेब में रखा
और चुपके से ले आया
अपने शयनगार में।
(*चूंकि चन्‍द्रमा अंग्रेजी में स्‍त्रीलिंग है, इसलिये उसे स्‍त्री की तरह दिखाया गया है, अतः पहली पंक्ति में शशि शब्‍द का प्रयोग किया गया है – अनुवादक)
और फिर मैं आया
ईरान – इमान खोमैनी के बड़े पोस्‍टर हर तरफ टँगे थे, नीचे लिखा थाः
‘‘अमेरिका एक नंबर का दुश्‍मन है दुनिया के दलित लोगों का,’’ और ‘‘अमेरिका इतना खतरनाक है कि अगर तुम थोडा़ भी अनदेखा करो तो वह तुम्‍हें नष्‍ट कर देगा।’’
यह एक ही ऐसा स्‍टाल था जो खुल्‍लमखुल्‍ला राजनीति करने में लिप्‍त हो गया था। मुझे विश्‍वास करने में हिचकिचाहट हो रही थी कि यह एक पुस्‍तक मेला हे। यह तो राजनीतिक प्रचारहै, अमेरिका को उसके श्रेय से वंचित रखने का, भारत की मौन अनुमति से। थोडा़ सा निराश होकर मैं आगे बढा़।
ईराक – प्रेसिडेन्‍ट सद्दाम हुसैन की शानदार तस्‍वीर एक रंगबिरंगी फ्रेम में लगाई गई थी। मगर यहाँ कोई प्रचार नहीं हो रहा था, सिर्फ एकता के बारे में पोस्‍टर्स लगे थे। पोस्‍टर्स और अखबार, अंग्रेजी, उर्दू और अरबी में, बड़ी संख्‍या में बाँटे जा रहे थे। मैंने एक पोस्‍टर और तीन अखबार उठा लिये (अंग्रेजी, उर्दू और अरबी) और दूसरे देश को चल पडा़।
फ्रान्‍स – यहाँ हर चीज़ फ्रेंच में लिखी गई है। मैं समझ नहीं पाया कि यहाँ क्‍या हो रहा है। एक भाषाविद् का जोश मुझमें हिलोरें लेने लगा। मैंने अंग्रेजी और फ्रेंच शब्‍दों की तुलना करने की कोशिश की उनके बीच की समानताएं एवम् विभिन्‍नताएं देखने के लिये।
       फ्रेंच                                अंग्रेजी
       Economic                         Economy
       Medecine                          Medicine
       Novembre                         November
       Statistique                         Statistics
       Produits                           Products
       Linguistique                       Linguistics   
       Syntaxiques                       Syntactics
       Lettres                            Letters
       Familiale                          Family
       Spendeurs                         Splendour
       Mondes                                  Months
       Musique                           Music
       Generales                         General
फ्राँस से मैं आगे गया
इंग्‍लैण्‍ड – यह एक बड़ी प्रदर्शनी है; अलग अलग तरह का ज्ञान लोगों को दिखाया जा रहा था। ब्रिटिश कौंसिल और अन्‍य कई प्रकाशक इसका संचालन कर रहे थे। मैंने एक किताब उठाई, फिर दूसरी उठाई। मेरे पास पैसे नहीं थे, मगर फिर भी मैं उनमें से कुछ हासिल करना चाहता था। और बेशक मुझे वो मिल ही गई। नीचे देखोः
१.       ‘‘मुझे तुमसे प्‍यार न करने दो, अगर मैं तुमसे प्‍यार नहीं करता तो (हरबर्ट)’’। यह समझाया गया है कि यहाँ सन्दिग्‍धता है, ‘‘पुनरूक्ति’’ के कारण। मुझे यह पता नहीं चला कि “पुनरुक्ति” शब्‍द का क्‍या मतलब हैं। मैंने इसे ‘‘उपयोग तथा दुरूपयोग’’ (एरिक पार्टरिज द्वारा लिखित) नामक पुस्‍तक से लिया
२.       ‘‘मैं अकेला रह गया, दृश्‍य दुनिया को खोजते हुए, न जानते हुए, क्‍यों।’’
मेरे स्‍नेह के स्‍तंभ हटा दिये गये मगर फिर भी इमारत खड़ी थी, जैसे संभल गई हो, अपनी ही शक्ति से।
(प्रस्‍तावना, II, 292-6: वर्डस्‍वर्थ की काल्‍पनिक कविताऍ)
३.       ‘‘...प्‍यार करता हूँ तुमसे?
बेशक, मैं तुमसे प्‍यार करता हूँ।
इसीलिये मुझे जाना होगा,
इससे पहले कि तुम जानो, कितना’’
(१२वीं घरेलू आपदाः लिन्‍डा गुडमैन की प्रेम कविताएं)
४.       ‘‘हर इंसान, मैं तुम्‍हारे साथ जाऊँगा,
और तुम्‍हारा मार्गदर्शक बनूँगा
तुम्‍हारी सबसे जरूरत की घड़ी में
तुम्‍हारे साथ रहूँगा।’’
(कोलरिज की कविताएं)
और कुछ रोमांटिक शीर्षक भी देखे, जो दिलचस्‍प थेः
१.       पीडित प्‍यार
२.       प्‍यार करने वाला गुलाम
३.       प्‍यार कोमलता से बोलता है
४.       अधिकृत लड़की
५.       सुन्‍दर पुरूष का कभी विश्‍वास न करों
६.       एक छोटी सी मीठी घड़ी
७.       प्‍यारा दुश्‍मन
८.       अधिकार से बाहर
इतना ऊब गया हूँ दुनियादारी की बातों से। मैं धार्मिक स्‍टाल्‍स पर गया, जो बड़ी संख्‍या में थे। मैं बहुत देरी से नहीं लौट सकता था। इसलिये मैंने सिर्फ भगवान श्री रजनीश का स्‍टाल देखने का निश्‍चय किया – जो काफी विवादित धार्मिक नेता हैं। वे मेरे पसन्‍दीदा भारतीय गुरूओं में से एक हैं। उनकी लिखी हुई एक हजा़र पुस्‍तकें प्रदर्शित की गई थीं। हर शीर्षक एक आत्‍मीय झलक देता है। ये कुछ शीर्षकः
१.       न पानी, न चाँद
२.       खाली नौका
३.       सूरज शाम को उगता है
४.       जो है, सो है; जो नहीं है, सो नहीं है
५.       रेत की विद्वत्‍ता
६.       बस यूँ ही
७.       अपने रास्‍ते से दूर हटो
८.       बिना पैरों के चलो, बिना पंखों के उड़ो, और बिना दिमाग के सोचो
९.       एक पागल आदमी का पथ प्रदर्शक ज्ञान की दिशा में
१०.   घास स्‍वयं ही उगती है
रूको ... और मनन करो, और तुम्‍हें उनमें से कुछ प्राप्‍त होगा, मेरा यकीन करो।
इसके बाद मैं फिर थाईलैण्‍ड गया एम०एल० मानिच वहाँ नहीं थे। मैं उनका और इंतजार नहीं कर सकता था। मैंने श्रीलंका-स्‍टॉल की एक लड़की के पास संदेश छोडा़ और एक किताब ली (फ्या अनुमन राजाधोन की याद में)। जिसकी इजाजत मैंने कल ही ले ली थी। मुफत में! उन्‍हें धन्‍यवाद।
मैं गलत गेट से बाहर निकला। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मुझे बस कहाँ से मिलेगी। मैंने सोलह साल के एक लड़के से, जो अनपढ़ लग रहा था, हिन्‍दी में पूछा।
‘‘आई०टी०ओ० कहाँ है, भाई?’’
‘‘मालूम नहीं, उसने जवाब दिया।
मैं इधर उधर घूम रहा था यह सोचते हुए कि कहाँ जाना चाहिए। एक ठीक-ठाक आदमी मेरी तरफ आया तो मैंने उससे पूछाः

‘‘क्‍या आप मुझे आई०टी०ओ० का रास्‍ता बनाएँगे, प्‍लीज?’
आप इस तरफ से सीधे निकल जाईये,’ उसने इशारे से बताया।
मैं उसके बताए रास्‍ते पर चल पडा़। मेरे सिर के ऊपर चाँद मुस्‍करा रहा है। जब मैं चल रहा था, तो वह मेरे साथ साथ चल रहा था। जब मैं रूका तो वह भी रूक गया।
मैंने उसकी तरफ सिर उठाकर देखा, उसने सिर झुकाकर मुझे देखा। कभी कभी वह
बादलों के पीछे छिप जाता मुझे अकेला, अंधेरे में, छोड़ कर।
ओह, मेरे प्‍यारे चाँद, मैं बुदबुदाया, मैं चाँद की रोशनी के आगोश में चलता रहा जब तक मैं आई०टी०ओ० बस-स्‍टॉप पर न पहुँच गया। वहाँ मैंने नग्‍न चन्‍द्रमा से बिदा ली।
यह थी मेरी आज की खोज, डार्लिग! चाहो तो मेरे अनुभव को बाँट लो, न चाहो तो ना सही। सब कुछ तुम पर निर्भर करता है। और अब मैं थक गया हूँ। तुम जब मेरे पास फिर से आओगी, तब तुमसे मिलूँगा!










मैं अपना प्यार - 27




*Amantiumirae amoris integration est (Latin): प्रेमियों के झगडे़ उन्‍हें जोड़ने का बेहतरीन साधन हैं – टेरेन्‍स 190-159  BC
सत्‍ताईसवाँ दिन
फरवरी ६,१९८२

एक मोटा शीर्षक आज के अखबार में ‘‘सूरिनाम में सैनिक विद्रोहः सूरिनाम कहाँ है? यह सवाल उठ सकता है। मैं तुम्‍हें नहीं बता सकता कि कहाँ है, मगर मेरे छोटे से नक्‍शे की ओर देखो और उसी को तुम्‍हारे सवाल का जवाब समझ लो।
यह है उस खबर का सारांशः
दि हेग, फरवरी 5 – सूरिनाम में सेना ने एक बार फिर सत्‍ता हथिया ली हैं; प्रेसिडेन्‍ट को इस्‍तीफा देने पर मजबूर कर दिया गया। नीदरलैण्‍ड की न्‍यूज़ एजेन्‍सी ANP के हवाले से AFP की रिपोर्ट
अब सत्‍ता लेफिटनेन्‍ट कर्नल देसी बूटेर्स, राष्‍ट्रीय मिलिटरी कौंसिल के अध्‍यक्ष के हाथ में बताई जाती है।
शायद सूरिनाम के बारे में कुछ और जानना योग्‍य होगाः सूरिनाम में भारतीयों की, खासकर पूर्वी उत्‍तर प्रदेश से आए हुए लोगों की एक बड़ी आबादी है, जिनके पूर्वज कई दशकों पहले यहाँ चले आए थे। उनमें से अधिकांश हिन्‍दू एवम् आर्य समाजी हैं, मगर भारतीय समुदाय में क्रिश्‍चन और मुसलमान भी काफी संख्‍या में हैं। ठीक हैं। उसके बारे में कुछ और बताता हूँ। सूरिनाम को १९७५ में नीदरलैण्‍ड से आजादी मिली है। यह ज्ञानकारी पर्याप्‍त है सूरिनाम को जानने के लिये। अब मैं भारत में अपने दैनंदिन अस्तित्‍व के बारे में अपनी डायरी की ओर लौटता हूँ।
आज का दिन मैंने पूरे उत्‍साह और उत्‍सुकता से बिताया। उसका पूरा पूरा सदुपयोग किया। सुबह मैं डिपार्टमेन्‍ट गया जिससे डिपार्टमेन्‍ट की हाल ही की गतिविधियों की जानकारी प्राप्‍त कर सकूँ। यहाँ मुझे पता चलता है कि मेरे रिसर्च गाइड कौन हें – डा० ए०के० सिन्‍हा। मैं उनका अकेला शोध-छात्र हूँ। अन्‍य गाइड्स को दो-दो छात्र दिये गए हैं। डा० प्रेम सिंह के पास इस साल कोई शोध-पत्र नहीं है क्‍योंकि उनकी विशेषता के क्षेत्र में (फोनोलोजी और हिंस्‍टोरिकल लिंग्विस्टिक्‍स) काम करने का प्रस्‍ताव इस साल किसी ने नहीं दिया है।
इस साल विद्यार्थियों की दिलचस्‍पी सिंटेक्‍स (वाक्‍य विन्‍यास) तथा सोशिओ लिंग्विस्टिक्‍स (सामाजिक भाषा विज्ञान) में हैं। नोटिस के अनुसार, मुझे अपने काम का सारांश इस महीने की पन्‍द्रह तारीख को देना है और एम. फिल. कमिटी की मीटिंग इस महीने की उन्नीस तारीख को फिर से होगी शोध-विषयों को अंतिम रूप देने के लिये। मैं डिपार्टमेन्‍ट से होस्‍टल की ओर चल पडा़। रेणु, जूली और टूम मेरी ही तरफ आ रही थीं। वे सेन्‍ट्रल लाइब्रेरी जा रही थीं अपने स्‍पेशल टयूटर से मिलनें।
मैं उनके साथ सेन्‍ट्रल लाइब्रेरी गया ‘‘थाई वाक्‍य विन्‍यास’’ नामक पुस्‍तक लेने, जिसे डा० उडोम वारोटमासिक्‍खाडिट ने लिखा है। मैंने केटेलॉग से किताब का नंबर लिया, मगर शेल्‍फ में वह किताब नहीं थी। फिर मैं लंच के लिये होस्‍टेल वापस आ गया। लंच के बाद इतना आलस आ रहा था। मैंने कुछ गाने सुने और, मेरी ऑख लगने ही वाली थी। मगर अचानक मेरे अंतर्मन ने मुझे झकझोर दिया। कल मैंने निश्‍चय जो किया था विश्‍व पुस्‍तक मेले में जाने का। अपने आलस पर काबू पाकर मैं कल के निर्णय को पूरा करने निकल पडा़।
मैं तीन बजे मेले में पहुँचा, टिकट खरीदा और अन्‍दर गया। सूचना केन्‍द्र पर जाकर पूछा कि मेरी दिलचस्‍पी की जगह पर कैसे जाऊँ। पहले मुझे जाना था हॉल नं० 8A में। मैंने किताबों की लंबी-लंबी कतारों पर नजर दौडा़ई और एक किताब उठा ली।
‘‘युवावस्‍था’’ एक मानसिक स्‍व-चित्रण डेनियल ऑफर, एरिक ओस्‍त्रोव और केनेथ आइ० होवार्ड द्वारा। मैंने विषय सूची पर नजर दौडा़ई और देखा कि दूसरा अध्‍याय काफी रोचक है। यह पांच प्रकार के ‘‘-स्‍व’’ का वर्णन करता है।
·         मानसिक स्‍वत्‍व
·         सामाजिक स्‍वत्‍व
·         लैंगिक स्‍वत्‍व
·         पारिवारिक स्‍वत्‍व
·         परिष्‍कृत स्‍वत्‍व
मैंने कागज के एक पन्‍ने पर इसे नोट कर लिया, जो मैं ऐसे ही किसी आकस्मिक ज्ञान को ध्‍यान में रखकर अपने साथ लाया था। फिर मैंने किताब को वापस स्‍टॉल में रख दिया। अब मैं अपनी रूचि की दूसरी जगह पर गया – अरब पैविलियन। यहाँ कई तरह की किताबें रखी हैं। भाग लेने वाले हैं जर्मनी से, ईराक से, अमेरिका से, थाईलैण्‍ड से एवम् अन्‍य देशों से। मैंने रूक कर हर स्‍टॉल पर नजर डाली। फिर, संयोगवश, मेरी नजर थाईलैण्‍ड के स्‍टॉल पर पड़़ी। बड़ा दयनीय प्रदर्शन! स्‍टॉल पर थोड़ी सी ही किताबें थी, और कोई पर्यवेक्षक भी नहीं था। काफी कम लोग वहाँ किताबें देख रहे थे। लगभग खाली था स्‍टॉल। देशभक्ति की भावना मेरे भीतर जोर मारने लगी। मैंने तय कर लिया कि और कहीं नहीं जाऊँगा, बल्कि इसी स्‍टॉल के आस पास मंडराऊँगा। मैं काफी दिलचस्‍पी से स्‍टॉल पर रखी हर किताब के पन्‍ने पलट रहा था। मुझे थाई स्‍पर्श का अनुभव हो रहा था। उस छोटे से स्‍टॉल पर करीब बीस किताबें थी, ब्रोशूर्स और कार्टून्‍स भी उनमें शामिल थे।
ये हैं महत्‍वपूर्ण किताबेः
१.       थाई रामायण
२.       बौद्ध्‍ धर्म का विवरण
३.       थाईलैण्‍ड का लोकप्रिय इतिहास (एम० जुम्‍साई)
४.       महामहिम सम्राट भुमिबोल अदुल्‍यादेज – थाईलैण्‍डके दयालु सम्राट (तानिन क्रेविक्सिन)
५.       स्‍याम के चीनी बर्तन (चार्ल्‍स नेल्‍सन स्पिन्‍कस)
६.       एन्‍ना और थाईलैण्‍ड के सम्राट
स्‍टॉल पर किताबों की एक लिस्‍ट है जिसे मैं औरों से ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण मानता हूँ। मैंने दो पॉकेट बुक्‍स पढ़ लीः क्रेटोंग (अंग्रेजी अनुवाद) और सिन्‍ड्रेला (थाई अनुवादः बच्‍चों के लिये कार्टून)। क्रेटोंग में मुझे श्री प्राण का एक प्रसिद्ध कथन मिला जिसका प्रिन्‍स प्रेम पुराछत्र ने अंग्रेजी में अनुवाद किया है। यह इस तरह से हैः
‘‘बताएं नहीं तुम्‍हारे नयन-बाण मेरा भविष्‍य,’
अपने शिकार पर शिकारी की तरह बरस
अगर तीर चलाना ही है, तो चलाओ सीधे मेरे दिल पर!
मरने के बजाय धमकाने की क्रूरता होगी मेरे पास। (प्राक्‍कथन से)।
क्रेटोंग और विमला के बीच कुछ दिलचस्‍प संवाद इस तरह से हैः
·         ‘‘अगर तुम मेरे साथ वाक़ई में चलना चाहो तो तुम्‍हें कुछ खोना ही पड़ेगा, जैसे कि बड़े भाई को प्‍यार करना, मगर छोटे को खोने की इच्‍छा न करना’’ (क्रेटोंग विमला से)
·         औरत के दिमाग को समझना उससे भी कठिन है जितना कोई सोचता है; सबसे गहरे समुद्र को नापना आसान हे। औरत के तीन सौ छलों को जानना असंभव है। (क्रेटोंग विमला से)
और यह हे अंतिम वाक्‍य जो मुझे याद हैः
·         ‘‘तुम शब्‍दों के जादूगर हो और वाक्‍यों के शिल्‍पी, जैसे जमीन को काटता हुआ एक झरना। हर कोई तुम पर निर्भर रह सकता है, इनकार नहीं मिलेगा’’ (विमला क्रेटोंग से)
जब मैं वहाँ खडा़ था तो कुछ लोग वहाँ किताबें देखने आए और पूछने लगे,
‘‘क्‍या ये बिकाऊ है?’’
‘‘स्‍टाल की देखभाल कौन कर रहा है?’’
‘‘ये कितने की है, ये वाली?’’
मुंबई की एक औरत ने पूछाः
‘‘क्‍या आपके पास थाई रसोई पर कोई किताब है?’’
‘‘क्‍या आपको वाकई में थाई खाने में रूचि है?’’ मैंने उससे पूछा।
उसने कहा, ‘‘हाँ’’ और मुझे बताने लगी कि वह अकसर मुंबई से बैंकाक जाती-आती रहती है। उसने मुझसे बैंकाक की किसी किताबों की दुकान का नाम पूछा जहाँ वह थाई रसोई के बारे में किताब खरीद सके। वह बड़ी उत्‍साही और चुलबुली किस्‍म की थी। वह बढि़या अंग्रेजी बोलती है, अमेरिकन लहजे में, मैंने उसकी दिलचस्‍पी की सराहना की। जब हम बात कर ही रहे थे, तो एक चीनी चेहरे-मोहरे का व़द्ध व्‍यकित्‍ थाईलैण्‍ड – स्‍टॉल के पास आया। जब मैंने उसकी ओर देखा तो एक ‘‘थाईपन’’ की भावना मुझे छू गई। मैंने उसकी कमीज की जेब पर बैच लगा देखाः

एम० जुम्‍साई
अंतर्राष्‍ट्रीय सेमिनार प्रतिनिधि।

ये वही है! एम० एल० मानिच जुम्‍साई, थाईलैण्‍ड के महान अंग्रेजी विद्वान, जिसके प्रति अपने अंग्रेजी ज्ञान के लिये मैं कृतज्ञ हूँ – जो मुझे उसके थाई-अंग्रेजी शब्‍दकोष की सहायता से प्राप्‍त हुआ। मैंने थाई अन्‍दाज में उनका अभिवादन किया। उन्‍होंने मुझे बताया कि वे खुद ही थाईलैण्‍ड से किताबें यहाँ लाए थे और उन्‍हें प्रदर्शित किया था। अब मुझे कोई अफ़सोस नहीं है; थाई-प्रदर्शन इतना दयनीय इसलिये था क्‍योंकि वह सिर्फ एक व्‍यक्ति की कोशिश का नतीजा था। बल्कि, मुझे इस पहल और रचनात्‍मक प्रयत्‍न के प्रति आदर महसूस हुआ, जिसने एक छोटे काम को बेहतरीन बनाने की कोशिश की थी। मैं आपका सम्‍मान करता हूँ, सर! फिर उन्‍होंने कहा,
‘‘प्रदर्शनी जल्‍दी में आयोजिति की गई। मैं काफी देर से आया। मैंने खुद से ही किताबें स्‍टॉल पर रखीं और उसके ऊपर लिखा ‘‘थाईलैण्‍ड’’
उन्‍होंने मुझसे पूछा कि क्‍या आसपास किसी होटल में रहने की व्‍यवस्‍था हो सकती है, जिससे वे मेले तथा होटल के बीच सुविधा से आना जाना कर सकें। पिछली रात वे विक्रम होटल (डिफेन्‍स कॉलनी) में रूके थे।
‘‘वह बहुत दूर है। मैं पास के ही किसी होटल में रहना चाहता हूँ।’’
मैं उन्‍हें और उनके श्री लंकाई मित्र को कनाट प्‍लेस लाया, १०० रू० प्रति कमरे वाले किसी होटल की तलाश में। वह बेहद थके हुए थे। पहले होटल में, जहाँ हम पहुँचे, सफलता नहीं मिली। श्री लंकाई दोस्‍त किसी नये कमरे में जाने के प्रति उदासीन था। मुझे ऐसा लगा कि वह पहले वाले कमरे में ही रहने को उत्‍सुक था। मैंने उसके लिये कमरा ढूँढना रोक दिया और एक रिक्‍शा बुलाकर उन्‍हें पहले वाले कमरे में छोड़ आने को कहा। एम०एल० मानीच जुम्‍साई ने धन्‍यवाद के अंदाज में मेरे कंधों को छुआ। मैंने उनके सम्‍मुख सिर झुकाया और थाई अंदाज में बिदा ली। शायद आपसे फिर मुलाकात हो जाये, सर!
कनाट प्‍लेस पर मैंने अपने होस्‍टेल के लिये बस पकडी-नये अनुभव और नई खोजों को दिल में संजोये। जिन्‍दगी कितनी दिलचस्‍प है!



शनिवार, 26 मई 2018

मैं अपना प्यार - 26




*Militae species amor est (Latin): प्‍यार भी एक तरह का युद्ध है – ओविद 43 BCAD C 17.
छब्‍बीसवाँ दिन
फरवरी ५,१९८२

आज सुबह मैं बड़े अच्‍छे मूड में उठा, दिमाग भी एकदम स्‍पष्‍ट था। बिस्‍तर से बाहर आने से पहले मैंने कैसेट के साथ तीन थाई गाने गाए।
देखो! दिल्‍ली में फिर वर्ल्‍ड बुक्‍स फेयर आ गया है, हर तबके के लोगों के लिये। यह प्रगति मैदान में हो रहा है ५ से १५ फरवरी १९८२ तक। श्रीमति इन्दिरा गांधीने पांचवे विश्‍व पुस्‍तक मेले के उद्घाटन समारोह की सदारत की।
कुछ पुस्‍तकें मुझे पसन्‍द थीं और कुछ अन्‍य, में स्‍वीकार करती हूँ, मुझ पर थोपी गई थी। कुछ किताबें मैं खुले आम पढ़ सकती थी और कुछ पेडों की टहनियों में छिपकर या बाथ-रूम में बन्‍द होकर। इस तरह से श्रीमति गांधी ने गुरूवार को किताबों से अपने रिश्‍ते का वर्णन किया।
मेले का आयोजन पढ़ने की आदत के विकास और उन्‍नति के लिये किया गया है (मैं इसमें से आधी बात पर विश्‍वास करता हूँ)। इस बार मेले में १०,००० से अधिक पुस्‍तकें पदर्शित की जा रही है, जिन्‍हे ४५० भारतीय एवं ३० देशों के ६५ प्रकाशकों ने प्रकाशित किया है। अकेले रूसी ही २०० लेखकों की ३,००० से अधिक पुस्‍तके प्रदर्शित कर रहे हैं। मेले की खास बात है ७००० चुनी हुई पुस्‍तकों का राष्‍ट्रीय प्रदर्शन जो १९८० में आयोजित चौथे पुस्‍तक मेले के बाद प्र‍काशित की गई हैं। लंच से पहले हमने (मैं, सोम्‍मार्ट और सोम्रांग) तय किया कि कल सुबह किताबें खरीदने जाएंगे।
मगर लंच के बाद प्रयूण आया और सोम्‍मार्ट को उसके साथ चलने के लिये मनाने लगा। सोम्‍मार्ट ने सोम्रांग को मजबूर किया कि वह उनके साथ चले। वे मेरी ओर भी देख रहे थे, मगर मैं काम से बाहर निकल गया। मैंने अपने दिमाग को कल के लिये तेयार किया था, आज के लिये नहीं, और चाहे जो भी हो जाए इस निर्णय का पालन करना ही पडे़गा। यहां हम अपने अपने रास्‍तों पर चल पड़े! जब मैं अपने काम (पढा़ई) से वापसआया तो मैंने अपने कमरे को नई तरह से सजाया, कुछ कपडे़ धोए, और अपने आप को व्‍यस्‍त रखा किसी नई और रचनात्‍मक चीज के बारे में सोचते हुए। जैसे ही मैं कमरे में आया वु‍थिपोंग ने आकर तुम्‍हारे होस्‍टेल की होस्‍टेल-नाईट के बारे में बताया। उसके कहने के मुताबिक, ओने दस मेहमानों को डिनर पर बुलाना चाहती थी (मुझे भी?)। मगर उसने इसे गैर जरूरी समझा। मैंने भी उसकी राय से सहमति जताई। इसलिये सिर्फ मिराण्‍डा की लडकियों को ही होस्‍टेल-नाईट में बुलाया गया। मालूम है एक एक मेहमान के लिये उन्‍होंने कितना पैसा दिया? दस रूपये! ये कोई मामूली बात नहीं है।
उसने मुझसे फिर पूछा कि तुम कब आ रही हो। मैं उससे सिर्फ यही कह सका, ‘‘देखते रहो!’’ और क्‍या बता सकता था मैं उसे? मुझे खुद को भी नहीं मालूम है। सॉरी, सर, मैं तुम्‍हें नहीं बता सकता! जब मैंने कपड़े धो लिये तो हम कॉमन रूम में पिंग-पोंग खेलने चले गए। प्राचक और महेश भी खेल में शामिल थे। चौथे गेम में मैं कोर्ट पर छा गया। मैं खेल के हर पहलू में उनसे श्रेष्‍ठ था (शेखी मार रहा हूँ?)। मगर पाँचवे और छठे गेम में मुझे हारना पडा़। वजह तो कोई नहीं थी, बस स्‍पोटर्समेन शिप। अच्‍छा सबक मिला मुझे! जब गेम खतम हो गया तो मै नहाया और अपने कमरे में एक कप कॉफी पी गया। सोम्‍मार्ट और सोम्रांग अभी लौटे नहीं हैं।
6.30 बजे आचन च्‍युएन सोम्‍मार्ट, सोम्रांग और मुझसे मिलने आया। दुर्भाग्‍य से होस्‍टेल में मैं अकेला ही बचा था। हमने मौसम और भारतीय जिन्‍दगी के बारे में कुछ देर बात की। आचन च्‍युयेन अपने शोध-प्रबंध के बारे में काफी संजीदा है (मैं तो उकता गया हूँ)। उसने मुझसे उसके एम.फिल. के शोध-प्रबन्‍ध के सारांश को संक्षिप्‍त करने और व्‍याकरण सुधारने को कहा (अगर जरूरी हो तो), मैं उसकी मदद करने को तैयार था। मगर मेरे पूरा करने से पहले ही वह चला गया। उसने मुझसे कहाः
‘‘कल सुबह मैं तुमसे मिलने फिर आऊँगा’’। उसके सारांश को पढ़ने में मुझे एक घंटा लग गया। कुछ व्‍याकरण की रचनाएं दुबारा करनी पड़ी, कुछ शब्‍दों के बदले दूसरे शब्‍द लिखने पड़े, मगर उसकी ‘‘परिकल्‍पना’’ को बिल्‍कुल जैसा का वैसा रखा गया है। उसकी ‘‘परिकल्‍पना’’ को मैं कैसे बदल सकता हूँ? लिंग्विस्टिक्‍स को छोड़कर बाकी सभी चीजों में मैं उससे छोटा हूँ! आज का काम हो गया, मेरी प्‍यारी। अब मैं रोकता हूँ। ओह, प्‍लीज़, भूल न जानाः मैं तुमसे प्‍यार करता हूँ, अभी भी।

मैं अपना प्यार - 25



*Adhebenda in iocanda moderatio (Latin): किसी मजा़क को लम्‍बा न खींचो – सिर्सरा 106-43 BC
पच्‍चीसवाँ दिन
फरवरी ४,१९८२

आज का दिन उत्‍साह से भरपूर है। मुझे सकारात्‍मक, प्रसन्‍न और आशावादी होना चाहिये हर चीज के बारे मेः घर में, काम पर, क्‍लास में, मेरे वर्तमान काम के बारे में – हर जगह! दिन भर मुझे नकारात्‍मक विचारों को अपने पास नहीं फटकने देना है, झगडा़ नहीं करना है, क्रोध नहीं करना है। उत्‍साह तेज गति वाला ईंधन है और नकारात्‍मक सोच डी०डी०टी० है मेरी कल्‍पना के लिये! मूल कारण यह है किः अगर हमें जीवन का आनन्‍द उठाना है तो उसके लिये उचित समय अभी है – न कि कल, न कि अगला साल, न कि मृत्‍य पश्‍चात् का कोई अन्‍य जीवन।
यह है मेरी आज की डायरी की प्रस्‍तावना। यह बड़ी शुभ बात थी कि सुबह-सुबह वुथिपोंग हमारे कमरे में आया था। वह ये पूछने आया था कि क्‍या मुझे तुम्‍हारा कोई खत मिला है। उसने एअरपोर्ट पर तुम्‍हारा स्‍वागत करने की इच्‍छा प्र‍कट की यदि उसे तुम्‍हारी वापसी की तारीख का पता चल जाये। हमने पिंग-पोंग का एक गेम खेला और फिर वह अपनी क्‍लास के लिये चला गया।
मैं कॉमन रूम से बाहर आने ही वाला था कि सिस्‍टर जूलिया (ख्रिश्‍चन) भीतर आई एक ईश्‍वरीय संदेश लेकर, उसमें खास तौर से हमें (अनुपम, सोम्‍मार्ट और मैं) आमंत्रित किया लाडक बुध्‍द विहार में शाम को होने वाली अंतरधर्मीय प्रार्थना-सभा में। अनुपम (भारतीय लड़का) होस्‍टल से बाहर था, सोम्‍मार्ट कहीं और था, वह उसे ढूँढ़ नहीं पाई थी। मैंने गेस्‍ट रूम में उसका स्‍वागत किया। उसने मुझे इस पवित्र मिशन के बारे में जानकारी दी, मुझे इस कार्य कलाप में हिस्‍सा लेने के लिए कहा, और इस शुभ समाचार को धार्मिक विचारों वाले लोगों में फैलाने को कहा पी०जी० होस्‍टेल में, ग्‍वेयर हॉल में और जुबिली हॉल में। मैंने अपना धार्मिक कर्त्‍तव्‍य पूरा किया इन तीनों होस्‍टेलों में नोटिस लगाकर। सोम्‍मार्ट ने नोटिस लिखने में मेरी सहायता की और अपनी क्‍लास में चला गया। मेरे अपने होस्‍टेल (पी०जी०मेन्‍स) में, मुझे थोड़ी कठिनाई हुई, मगर ग्‍वेयर हॉल में मै गलत आदमी के पास, ऑफिस-सेक्‍शन के एक कलर्क के पास, पहुँच गया।
पहले तो उसने बिना किसी कारण के सहयोग देने से इनकार कर दिया। मैंने उसे मनाया और उसके ‘‘उछलते दिमाग’’ को शांत किया, उसे अपनी ओर मिला लिया मगर वह फिर भी हिचकिचा रहा था कि इसे करे कैसे। वह कुछ इस तरह बड़बडा़ रहा थाः नोटिस लगाने से पहले इसे किसी रेजिडेन्‍ट-टयूटर द्वारा हस्‍ताक्षरित होना जरूरी है। तब जाकर मुझे परिस्थिति समझ में आई। वह मेरे लिये कुछ नहीं कर सकेगा। मैंने अपना प्‍लान बदल दिया। मैं यूनियन-प्रसिडेन्‍ट (मि० प्रवीण) के पास गया, जिसे मै जानता हूँ और इस नोटिस को लगाने में उसकी मदद मांगी। यहाँ बात हल हो गई। कोई कठिनाई नहीं हुई, जरा सी भी नहीं। उसने चौकीदार से कहा कि नोटिस को मेस के गेट पर लगा दे। इतना आसान था ! मैं आगे चला, जुबिली हॉल की ओर इस उम्‍मीद से कि प्रयून से मदद ले लॅूगा। सौभाग्‍यवश, मुझे वहाँ मणिपुरी दोस्‍त मिल गए। मैंने उनसे पूछा कि इस नोटिस को कहाँ लगा सकता हूँ। उन्‍होंने मेरी सहायता की। मैं अपने होस्‍टल वापस गया कुछ रचनात्‍मक और उत्‍साहपूर्ण काम करने। मैं ग्‍वेयर हॉल से होकर वापस नहीं आया।
मैं दूसरे रास्‍ते से आया। मैंने सिस्‍टर जूलिया को उस भाग के पी०जी० वीमेन्‍स, मिराण्‍डा हाऊस और अन्‍य होस्‍टलो से आते देखा। मैंने उसे नहीं बताया कि मैंन क्‍या-क्‍या काम किया। यह मेरे लिये काफी दूर है। मैं अपने कमरे में वापस लौटा। पन्‍द्रह मिनट बाद मैं कमरे में एक कुर्सी में धँस गया। दो होस्‍टेल-कर्मचारी (ओम प्रकाश और उसका दोस्‍त) मेरे पास आए विवाह-पूर्व सेक्‍स समस्‍या का समाधान पूछने। उसकी कौन मदद कर सकता है (ओम प्रकाश के दोस्‍त की)! दूसरी तरह से कहूँ तो वे मुझे शायद कोई ‘‘विवाह-समुपदेशक’’ समझते हैं, जो उनकी रोमान्टिक समस्‍याओं को सुलझा देगा।
‘‘हमारे सामने एक समस्‍या है, सर,’’ ओम प्रकाश ने कहा।
‘‘क्‍या समस्‍या है?’’ मैंने पूछा।
तब उसने अपने गरीब दोस्‍त की पूरी कहानी सुनाई,
‘‘मेरे दोस्‍त ने ...वो...संबंध...बना लिये...अपनी गर्लफ्रेन्‍ड के साथ। अब उसको बच्‍चा होने वाला है। यह अभी बाप नहीं बनना चाहता। इसे क्‍या करना चाहिए?’’ गर्भपात के लिये कोई दवाई जानते हैं? प्‍लीज इसे बताईये।
मैं बस हंसने की वाला था। ‘‘तुम मुझे समझते क्‍या हो?’’ मैं कोई डॉक्‍टर नही हूँ, न ही विवाह-समुपदेशक।
मगर दुबारा सोचने पर मुझे भी उसके बारे में चिन्‍ता ही हुई। वे मेरे पास मदद मॉगने आए थे और मुझे उनको निराश नहीं करना चाहिए था, मैंने अपने आप में सोचा। फिर मैंने उनसे दो में से एक काम करने को कहा।
१.       किसी डॉक्‍टर से मिलकर सलाह ले
२.       शादी कर ले और पितृत्‍व की जिम्‍मेदारी निभाए
मालूम नहीं मेरी सलाह का उन पर क्‍या असर होगा। मगर मैं उनके लिये इतना ही कर सकता था। भगवान उन्‍हें आर्शीवाद दे! मैं बेवकूफ ही सही।
मुझ पर यकीन करो, स्‍वीट हार्ट, आज मैंने एक बडा़ काम किया है। मैंने अंतर-धार्मिक प्रार्थना सभा में हिस्‍सा लिया जो लाडक बुध्‍द विहार में (ISBT के पास) आयोजित की गई थी। अकेला नहीं गया। मैं वुथिपोंग और महेश को भी साथ ले गया। हम वहाँ समय पर पहुँच गए (5.30 बजे) करीब चालीस लोग हॉल में मौजूद थे। प्रार्थना-हॉल के प्रदेश द्वार पर हमारा स्‍वागत किया गया और सिस्‍टर जूलिया एवम् फादर विन्‍सेन्‍ट (चेयरमेन) ने हमें अपनी सीटें दिखाई। वहाँ जो विभिन्‍न धर्मो और संस्‍कृतियों से आए थेः बौद्ध, ख्रिश्‍चन, हिन्‍दू, उनमें सबसे महत्‍वपूर्ण व्‍यक्ति थे फादर विन्‍सेन्‍ट, लामा लोबसांग, डा०श्रीवास्‍तव एवं दो अन्‍य (मुझे उनके नाम नहीं मालूम)। सभा का आयोजन एक चौक मं किया गया था। हम एक दूसरे के आमने-सामने बैठे।
हमारी सभा का आरंभ हुआ फादर विन्‍सेन्‍ट के उद्घाटन भाषण से, जिसके बाद विश्‍व शांति के लिये धार्मिक गीत प्रस्‍तुत किये गए, एक ख्रिश्‍चन सिस्‍टर द्वारा गाया गया गीत बहुत सुरीला था और श्रोतओं पर उसने बहुत असर किया। मुझे उसके गीत ने बहुत प्रभावित किया। फिर हमने सभा का समापन विश्‍व-शांति में धार्मिक योगदान पर चर्चा से किया और सबसे अन्‍त में हमने अमेरिका और सोवियत संघ के बीच हथियारों की बढ़ती प्रतिद्वन्द्विता पर चिन्‍ता प्रकट की। हम अपनी चिन्‍ता को किस प्रकार प्रकट करें, इस बारे में कुछ सुझाव दिए गए। कुछ लोगों ने जो़र देकर कहा कि भारतीय प्रधानमन्‍त्री इन्दिरा गांधी को एक पत्र भेजा जाए। और लोगों ने कहा कि इसे संयुक्‍त राष्‍ट्र को भेजना बेहतर होगा। मगर अन्‍त में हम इस नतीजे पर पहुँचे कि दोनों प्रस्‍ताव मान लिये जाएं। सभा के समापन से पूर्व चर्चा के अगले विषय को निश्च्ति किया गया। विषय है ‘‘इतने सारे धर्म, इतना सारा दुःख’’, जब सभा समाप्‍त हो गई तो सिस्‍टर जूलिया ने चेयरमेन, फादर विन्‍सेन्‍ट से मेरा परिचय करवाया। वुथिपोंग और महेश हॉल के बाहर मेरा इंतजार कर रहे थे। फिर हम तीमारपुर गए जहाँ वुथिपोंग ने मोमबत्‍ती जलाई।
हम बड़े अचरज में पड़ गए कि हमारी मेज पर डिनर रखा था। साथ में संदेश था
मेरे प्‍यारे फी-माइ,
मैं डिनर के लिये यहाँ आई हूँ। बाहर कडा़के की ठण्‍ड है। मैं तुम्‍हारे और फी डेविड (मेरा उपनाम) के वापस आने तक इन्‍तजा़र नहीं कर सकती। ये डिनर रख रही हूँ। ढेर सारे प्यार और सम्‍मान के साथ,
ओने
हमने ओने का डिनर बहुत पसन्‍द किया और उसकी हमारे बारे में चिन्‍ता की भी सराहना की। मैंने वुथिपोंग के साथ डिनर खाया, फिर एक कप कॉफी पी। वुथिपोंग ने डिनर की यह कहते हुए प्रशंसा की कि ऐसा लज्‍जतदार खाना उसने पिछले कई सालों में नहीं खाया है। मैंने भी सहमति दर्शाई। मुख्‍य बात है कि ओने वह लड़की है जो उसके दिल में है। काश, ओने भी उसे प्‍यार कर सकती। मगर उसकी जिन्‍दगी इतनी भाग्‍य-निर्णायक है कि यह प्‍यार का नहीं, बल्कि भाग्‍य का मामला है। मैं ईश्‍वर से प्रार्थना करुँगा कि वह अपनी लगन और कोशिश में सफल हो। मैं अपने होस्‍टेल रात के 9 बजे पहुँचा। सोम्‍मार्ट अपनी पढा़ई में मगन था।
उसने मेरे लिये दो केले रखे थे। मुझे अपनी लन्‍दन की एक मित्र का पत्र-बधाई कार्ड मिला। ये बडा़ लाजवाब कार्ड है। आज तक मुझे ऐसा कार्ड नहीं मिला था। यह एक बन्‍दर का स्प्रिंग-बॉक्‍स है। जब तुम इसे खोलते हो तो बन्‍दर तुम्‍हारी तरफ देखकर गुस्‍से से मुस्‍कुराता है। उसका शुक्रगुजा़र हूँ! अब, मेरी जान, मैं लिखना बन्‍द करता हूँ, क्‍योंकि रात का एक बज चुका है। मैं कुछ गाने सुनूँगा और फिर सो जाऊँगा।
मुलाका़त होने तक, डार्लिग!
ढेर सारा प्‍यार।















मैं अपना प्यार - 24




*Silentium mulieri praestat ornatum (Latin): खामोशी औरत का सबसे सुन्‍दर आभूषण है – एनोन
चौबीसवाँ दिन
फरवरी ३,१९८२

कितना परिवर्तन! ज़रा स्‍टेट्समेन के शीर्षक तो देखो। सबसे बडा़ शीर्षक हैः टेलिफोन तथा डाक दरों में भारी वृद्धि। यह है उस खबर का सारांश।
नई दिल्‍ली। मंगलवार – सरकार ने आज डाक तार और टेलिफोन की दरों में भारी वृद्धि की घोषणा की, जिससे खजाने को १०० करोड़ की आय होगी।
यह वृद्धि, जिसके अंतर्गत रजिस्‍टर्ड पार्सल/पत्र, मनी-ऑर्डर, टेलिग्राम, फोनोग्राम, टेलेक्स एवं टेलिफोन का किराया शामिल है १ मार्चसे लागू होगी।
दुनिया बड़ी तेजी से बदल रही है। हर चीज़ अपनी अपनी माँग पूरी करने की दिशा में बढ़ रही है। जिन्‍दगी के बारे में भी यही नियम लागू होता है। हम इससे बच नहीं सकते, है ना?
कल रात को दस बजे बिजली चली गई। अभी तक नहीं आई है। मैं कुछ भी नहीं पढ़ पाया। भरपूर नींद ली – मीठे सपनों के साथ। मैंने सपने में देखा कि तुम पालम एअरपोर्ट पर हवाई जहाज से उतर रही हो। तुम काफी तन्‍दुरूस्‍त, कुछ मोटी नज़र आ रही हो। मैंने मुस्कुरा कर अपना प्‍यार जाहिर किया, जवाब में तुमने भी मुस्‍कुराहट बिखेरी। तुम मेरी बाँहों में दौड़ी चली आई। मैंने कसकर तुम्‍हारा आलिंगन किया। जब मैं दिल्‍ली में तुम्‍हारा स्‍वागत करते हुए तुम्‍हारा चुंबन लेने ही वाला था तो नींद खुल गई, सपना खत्‍म हो गया।
मगर मुझे इसका कोई अफसोस नहीं है। ये तो बस, सपना था, वास्‍तविक जीवन थोड़े ही था। हमारी जिन्‍दगी ज्‍यादा मूल्‍यवान और ज्‍यादा अर्थपूर्ण है बनिस्‍बत किसी सपने के। फिर भी, सपने में मैंने जो भी देखा वह इस बात की याद दिला रहा था कि ‘‘तुम अभी भी मेरे दिल में हो।’’ क्‍या इससे बढ़कर कोई और बात है? मेरे खयाल में तो नहीं है।
आज 12 बजे मुझे एम०फिल० कमिटी के सामने इन्‍टरव्‍यू में बुलाया गया था अपने शोध कार्य के लिये विषय का चयन करने। मैं 30 मिनट पहले ही डिपार्टमेंट पहुँचा। इन्‍टरव्‍यू 1.00 बजे तक के लिये स्‍थगित हो गया। मैं डिपार्टमेन्‍टल लाइब्रेरी में इंतजार कर रहा था। जब इन्‍टरव्‍यू का पुनर्निधारित समय आया, तो हम (एम०फिल० के विद्यार्थी) सेमिनार रूम में एकत्रित होकर अपनी अपनी बारी का इंतजार करने लगे। मुझे चौथे नंबर पर बुलाया गया। पहले मैं काफी नर्वस था, मगर जब मेरा नंबर आया तो मैं काफी तनाव-मुक्‍त और आत्‍म विश्‍वास से भरपूर था। मुझसे कुछ सवाल पूछे गए जैसे कि मैं कौन से विषय पर काम करना चाहता हूँ और अपना शोध-प्रबंध किस तरह लिखने वाला हूँ। बस, इतना ही। मुझे अपने प्रस्तुतीकरण पर संतोष है। मैं एक और बात कहना चाहता हूँ। इन्टरव्यू शुरू होने से जरा पहले, हम सारे विद्यार्थी बेहद घबराए हुए थे। हर कोई हताश और बेचैन था। कुछ लोगों ने तो इन्‍टरव्‍यू की अच्‍छी खासी तैयारी की थी। जहाँ तक मेरा सवाल है, मैंने भी थोड़ी-बहुत तैयारी तो की ही थी।
आमतौर से हमारे दिलों में इन्‍टरव्‍यू-बोर्ड के बारे में भयानक गलतफहमियाँ होती है। हम उसे फाँसी का फन्‍दा समझते हैं, जिससे हम दूर ही रहना पसन्‍द करते हैं। मगर ऐसी बात बिल्‍कुल नहीं है। ये तो बस एक ग्रुप होता है अनुभवी व्‍यक्तियों का जो हमसे विचार जानना चाहते हैं, हमारा मार्ग दर्शन करना चाहते हैं, और हमारे काम में मदद करना चाहते हैं। हम वस्‍तुएँ हैं और वे हैं – मार्केट। दोनों ही एक दूसरे पर निर्भर रहते हैं, और एक के बिना दूसरे का अस्त्तिव संभव नहीं है। यह वास्‍तविकता है। उनसे डरने को कोई जरूरत नहीं हैं। वे भी हमारी ही तरह इन्‍सान हैं। उनकी उपस्थिति में स्‍वयं को हीन समझना भी ठीक नहीं है। यही है सफलता की कुंजी।
मैं दोपहर 1.40 बजे डिपार्टमेन्‍ट से निकला। मुझे किरण (लाइब्रेरियन-महिला) मिली। वह हड़ताल पर है। उसने मुझे बताया कि उसने तुम्‍हें लिखा है और खत को कल ही पोस्‍ट किया है। मुझे डर है कि पट्टानी से बैंकाक के लिये निकलने से पहले वह तुम्हें मिलेगा नहीं। मैंने उससे कहा कि मैं तुम्‍हें उसके खत के बारे में बताऊँगा। मगर इस मसले पर सोचने के बाद मैंने ऐसा न करने का निश्‍चय किया। वजह यह है कि मेरे पास पैसे नहीं हैं। बस, इतनी सी बात! मैं होस्‍टेल की ओर लपका ‘‘लेट-लंच’’ लेने के लिये। मगर बहुत जयादा देर हो चुकी थी। खाना नहीं मिला।
मगर किस्‍मत मुझ पर मेहेरबान है। मुझे मेस में मेज़ पर रखी तीन चपातियॉ मिल गई। यही मेरा ‘‘लेट-लंच’’ था। थकावट और भूख के कारण मैं पीठ के बल लेट गया और घंटो तक सोता रहा। जब मैं उठा तो हेमबर्गर मुझसे खाया नहीं गया। मैं कैन्‍टीन गया: ‘‘उधारी पर’’ ऑमलेट खाने और चाय पीने के लिये गया। जब मैं चाय की चुस्कियॉ ले रहा था, मेरी नज़र एक बन्‍दर पर पड़ी जो गुस्‍से में पेड़ को हिला रहा था। मालूम नहीं वह किससे नाराज था। शायद अपनी ‘‘गर्ल फ्रेन्‍ड’’ से। मगर उसे देखने में मजा आ रहा था। मैं इसका इस तरह से आनन्‍द उठाता हूँ। मैंने अपने खाते पर हस्‍ताक्षर किये और थोड़ा बहुत पढ़ने के इरादे से कैन्‍टीन से निकल कर प्‍ले-ग्राउण्‍ड पहुँचा। मैंने देखा कि प्रयूण मैदान के बीच में बैठा कुछ पढ़ रहा है। मैंने उसकी पढ़ा़ई में दखल नहीं डाला। मैं अपनी पढा़ई करता रहा। जब मैंने सिर उठाकर देखा तो वह शायद हवा में गायब हो गया था। मैं, बहरहाल, पढ़ता रहा। ईरानी लड़की अपने आपको ‘‘फिट’’ रखने के लिये ग्राउण्‍ड का चक्‍कर लगा रही है। निकम्‍मे भारतीय भी वही कर रहे है। मुझे भी वही करने की प्रेरणा हुई। मैंने ग्राउण्‍ड के दो चक्‍कर लगाए और जमीन पर गिर पडा़। मैं बेहद थका हुआ था। सर्दियों में यह पहली बार था, जब मैंने दौड़ने की कसरत की थी।
अब मैं थोडा बहुत चुस्‍त हो गया हूँ। मैं शेखी नहीं मार रहा हूँ, मुझ पर यकीन करो! दौड़ने की कसरत के बाद मैं होस्‍टेल के भीतर गया, दो गेम कैरम के खेले और एक गेम पिंग-पोंग का। और यह अन्‍त था मेरे ‘‘कीप-फिट’’ का। अब मैं ज्‍यादा तन्‍दुरूरत लगता हूँ। तन्‍दुरूस्‍ती दौलत से हजार गुना मूल्‍यवान हैं। या फिर दूसरी कहावत हैः स्‍वस्‍थ शरीर में स्‍वस्‍थ दिमाग रहता है। ठीक है, प्‍यारी, अब मैं डिनर के लिये डायरी रोकता हूँ। बाय, स्‍वीट हार्ट।




मैं अपना प्यार for Kindle

  अपना प्यार मैं दिल्ली में छोड़ आया   एक थाई नौजवान की ३० दिन की डायरी जो विदेश में बुरी तरह प्‍यार में पागल था                ...