बुधवार, 23 मई 2018

मैं अपना प्यार - 13




*Non tibia b ancilla est incipienda venus (Latin): जब प्रेम प्रदर्शित करते हो, तो नौकरानी से आरंभ मत करो Ovid 43 BC – AD C.17
तेरहवाँ दिन
जनवरी २३,१९८२

कल की रात मेरे लिये बड़ी खतरनाक थी। मैंने कितनी ही कोशिश क्‍यों न की, सो न पाया। मेरा दिमाग एक युद्ध का मैदान होता जा रहा  जहॉ मैं युद्ध जीत सकता हूँ मगर लडा़ई हार जाऊँगा। ऐसा कहीं इसलिये तो नहीं, कि मैंने जिन्‍दगी को काफी हलके से लिया, इसीलिये मैं दुखी हो गया? अंततः मुझे अपने आप को ही ज़िम्‍मेदार मानना होगा।
और अब, मेरी जान, आज के बारे में। सुबह 11.30 बजे मेरे कमरे में एक दारूण घटना घटी। जब मैं आधी नींद में था तो मुझे महसूस हुआ कि कमरे में कोई चीज घुसाई गई है। मैंने फौरन पलटकर उस ओर देखा। एक खत दरवाजे के नीचे पडा़ था। मैं विस्‍तर से कूदा, उसे उठाया, पानेवाले का पता पढा़। मगर वह मेरे लिये नहीं था, वह मेरे रूप-मेट सोम्‍मार्ट के लिये था। मुझ पर वज्राघात हो गया। बारिश नहीं, बल्कि झडी़ लग जाती है! भगवान ही जाने, तुम्‍हारा खत मुझे कब मिलेगा? मैं जिन्‍दगी के हर क्षेत्र में हारा ही हूँ। क्‍या मैं हारने के लिये ही पैदा हुआ था? क्‍या मुझे तुम्‍हारे खत की उम्‍मीद बिल्‍कुल छोड़ देनी चाहिए? इन निराशाजनक सवालों से मुझे जुझना है अपने अस्तित्‍व की रक्षा के लिये। खाने के फौरन बाद मैं पोस्‍ट ऑफिस गया। कुछ तो करना होगा, वर्ना मेरा दिल टुकडे-टुकडे हो जाएगा। मैंने एक छोटा-सा तीन पंक्तियों का पत्र तुम्‍हें भेज दिया। इससे ज्‍यादा लिखने की हिम्‍मत ही नहीं हुई। मैं बस इतना बताना चाहता था कि हर चीज की एक सीमा होती है और हरेक के अपने-अपने दुख-दर्द होते हैं। इसके बाद मैंने काफी हल्‍का महसूस किया और मैं आर्टस फैकल्‍टी की लायब्रेरी चला गया, किताब वापस करने जिसकी जमा करने की तारीख दो दिन पहले गुजर चुकी थी। सौभाग्‍य से मुझे जुर्माना नहीं देना पडा़। अकेलापन और परित्‍यक्‍त महसूस करते हुए में अचानक च्‍युएन के पास गया। वह अपने कमरे में नहीं था। मैंने उसके लिये मेसेज छोडा़ और अपने कमरे पर वापस आ गया। मैंने एक आदमी को तिकोने लॉन में (तुम्‍हारे होस्टेल के पास) पेड़ के नीचे लेटे देखा। वह आराम जैसा लग रहा था, मैं धीरे से, सावधानी से उस ओर गया देखने के लिये कि क्‍या वह आराम था? हाँ, वही तो है! आराम! उसे थोडा़ आश्‍चर्य हुआ कि मैंने उसे पहचान लिया था।
असल में, वह इम्तिहान के लिये कुछ नोट्स पढ़ रहा था और उसकी आँख लगने ही वाली थी, जब मैं उसके पास पहुँचा। मैं भी पीठ के बल लेट गया और हमने दस मिनट तक बातें कीं फिर, मैं खुद ही सो गया। एक ही डाल के पंछी! मैं 4.30 बजे उठा और वापस होस्‍टल की ओर चल पडा़। मैं होस्‍टेल का रास्‍ता पार भी न कर पाया था कि मैंने पोस्‍टमेन को होस्‍टेल के गेट से बाहर निकलते देखा। मेरा दिल बुरी तरह धड़कने लगा। मैं भागकर होस्‍टल में घुसा यह देखने के लिये कि तुम्‍हारा कोई खत तो नहीं आया। उसका कोई नामो-निशान नहीं! मेरी मायूसी को बयान नहीं कर सकता। मेरी जान, तुम मेरे प्रति बड़ी ठण्‍डी और निष्‍ठुर हो।
आज रात खाने में हमें फिश-करी दी गई। भीड बहुत ज्‍यादा थी। मुझे अपने लिये और सोम्‍मार्ट के लिये एक मेज़ लगानी पड़ी। ये एक तरह की सेल्‍फ-सर्विस थी। चम्‍मच पर्याप्‍त नहीं थे। हमने हाथ से खाया और उसका लुत्फ़ उठाया। यह मुझे दूर-दराज के एक गाँव की याद दिला गया जहाँ मैंने अपना बचपन इसी तरह से बिताया था – मेरे माता-पिता और अन्‍य गाँव वालों के साथ। मैंने जल्‍दी-जल्‍दी डिनर खत्‍म किया और अपने कमरे में वापस आ गया। मेरे दिमाग पर फिर निराशा छा गई। मैंने अपने डबडबाए चेहरे को रजाई में ढँक लिया आँसू मेरे गालों पर बह रहे थे। सच कहूँ, मैं आँसू रोक नहीं पाता। मैं एक भावना प्रधान लड़का हूँ जो एक झूठे, गुलाबी सपने में रहता है। हाँ, मैं एक बच्‍चे की तरह चाँद के लिये रो रहा था। सोम्‍मार्ट को मेरी खामोशी से बडा़ आश्‍चर्य हुआ। मैं उसे बेचैन नहीं करना चाहता था, और फिर मैंने वॉयस ऑफ अमेरिका रेडियो स्‍टेशन लगा दिया जिससे चुप्‍पी टूट जाए और उसका ध्‍यान मुझसे हट जाए। मैं बड़े ध्‍यान से रेडियो सुन रहा था, निराशा छँटने लगी थी। मैं संभल गया था। अब मैं फिर से काम करने वाला हूँ। बेकार की बातों पर कितना वक्‍त बरबाद हो गया, विगत के बारे में सोचने पर, भविष्‍य की चिन्‍ता करने में कितना समय खो दिया। जिन्‍दगी में सिर्फ फूल ही फूल तो नहीं हैं, न ! संक्षेप में बर्बाद हुए समय को पूरा करने के लिए मैं काम करने वाला हूँ। मगर, प्‍लीज़ भूलना मत, कि मैं अभी भी तुम्‍हें अपनी बाँहों में देखना चाहता हूँ। जितनी जल्‍दी हो, उतना ही बेहतर!
प्‍यार, पागलपन की हद तक!




मैं अपना प्यार - 12



*Littore quot conchae tot sunt in amore Dolores (Latin): दुनिया में गम इतने हैं, जितनी समुद्र तट पर सींपियाँ Ovid 43 BC – AD C.17
बारहवाँ दिन
जनवरी २२,१९८२

हुर्रे ! दुनिया का एक और विशेष दिन हैः एकता दिवस। वाशिंग्‍टन, D.C., जनवरी २१ प्रेसिडेन्‍ट रीगन ने कल घोषणा की कि ३० जनवरी अमेरिका में ‘‘एकता दिवस’’ के रूप में मनाया जाएगा, निलम्बित पोलिश ट्रेड यूनियन के समर्थन में, रिपोर्टः ए०एफ०पी०
‘‘एकता’’, उन्‍होंने कहा, ‘‘वास्‍तविक जगत में उस संघर्ष का प्रतीक है जब तथाकाथिन ‘‘मजदूर’’ मौलिक मानवाधिकारों और आर्थिक अधिकारों के समर्थन में खड़े हुए थे और उन्‍हें सन् १९८० में ग्‍दान्‍सक में विजय मिली थी। ये हैं – काम करने का अधिकार और अपने परिश्रम का फल पाने का अधिकार; एकत्रित होने का अधिकार; हड़ताल करने का अधिकार; और विचारों की स्‍वतन्‍त्रता का अधिकार’’ (दि स्‍टेट्समेन)
11.30 से 12.30 बजे तक लिंग्विस्टिक्‍स डिपार्टमेन्‍ट में एक सेमिनार था। रॉबर्ट डी०किंग, यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्‍सास के प्रसिध्‍द ऐतिहासिक-भाषविद् ने ‘‘सिंटेक्टिक चेंज (पदविन्‍यास-परिवर्तन) पर भाषण दिया। मैं सेमिनार में जाना चाहता था, मगर ऐन मौके पर मैंने न जाने का निश्‍चय कर लिया। दिल ही नहीं हो रहा था सेमिनार में जाने का। मुझे सबके सामने अपना तमाशा बनाना अच्‍छा नहीं लगता, इसलिये मैंने इस मौके का लाभ नहीं उठाया। मुझे लगता है कि मैं एक झूठे-स्‍वर्ग में रह रहा हूँ। सेमिनार में जाने के बदले मैं सोम्‍मार्ट के साथ किताबों की दुकान में गया, एक पत्‍थर-दिल को भूल जाने के लिये, जिसके लिये दिल में थोड़ी उम्‍मीद लिये जी रहा हूँ।
हमने ड्रेगोना-चाइनीज़ रेस्‍तराँ में लंच लिया। वापसी में सोम्‍मार्ट की नजर अपनी गर्ल-फ्रेण्ड पर पड़ी जो दूसरे लड़कों के साथ बैठी थी। उसे बहुत बुरा लगा। वह सोम्‍मार्ट को देखकर मुस्‍कुराई, मगर वह इतना निराश हो गया था कि मुस्‍कुरा न सका। मेरे साथ होस्‍टेल वह इस तरह आया जैसे उस पर वज्राघात हो गया हो। मैंने उसे शांत रहने की सलाह दी, और रास्‍ते भर उसे चिढा़ता रहा। मगर, वह आधा खुश और आधा दुखी था। उसे लग रहा था कि दुनिया उसके विरूद्ध जा रही है। ‘‘प्‍यार का ऐसा तोहफा़’’ जिससे आदमी को पीडा़ होती है, मुझे हैरत में नहीं डालता। आदमी अपने आप से हारने लगता है। बाहय परिस्थितियों को अपना शिकार करने देता है। कुसूर किसका है? किसे दोष देना चाहिए? जवाब देने का दुःसाहस मैं नहीं करुँगा, क्‍योंकि मैं खुद भी उसी कश्‍ती पर सवार हूँ। जीवन परिस्थितियों से अलग नहीं हो सकता। इन्‍सान को जीवन की कई प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। खुशी,दुख, सफलता, असफलता इत्‍यादि। जीन पॉल सार्त्र ने एक बार कहा थाः ‘‘इन्‍सान अभिशप्‍त है मुक्‍त होने के लिये,’’ इसका सबूत ढूँढ़ने के लिये दूर जाने की जरूरत नहीं है।
जब आदमी अथाह दुख में डूब जाता है, तो उसके आँसुओं का सैलाब बन जाता है। ये सारे खयाल मैं आज की डायरी में इस लिये लिख रहा हूँ कि मेरे बेचैन दिमाग को कुछ सुकून मिल सके। जब से तुम गई हो, मैं अपने बेचैन दिमाग से संघर्ष कर रहा हूँ। पढा़ई नियमित रूप से नहीं कर पा रहा हूँ। अकसर अपना आपा खो बैठता हूँ। मैं वह सब करने की कोशिश तो करता हूँ, जो मुझे करना चाहिये, मगर अपने उद्धेश्‍य में सफल नहीं हो पाता। हे भगवान, मुझे शांति, शक्ति और सांत्‍वना दो!
आज रात को मैंने होस्‍टेल में खाना नहीं खाया। तुमसे ‘‘सम्‍पूर्ण जुदाई’’ ने मेरे दिमाग को निराशा के गर्त में धकेल दिया है। मैं ग्‍येवर हॉल गया म्‍यूएन की किताब वापस करने, मगर उसका कमरा बन्‍द था। फिर मैं बूम्‍मी के पास गया। म्‍यूएन की किताब उसके पास छोड़कर वापस होस्‍टेल आ गया।
आज डायरी अपनी इच्‍छा के विपरीत लिख रहा हूँ। ये कठोर, अपठनीय और व्‍यंग्‍यात्‍मक लग सकती है। मैं चाहूँगा कि तुम मुझे माफ कर दो।
अभी भी तुमसे प्‍यार करता हूँ।





  

मैं अपना प्यार - 11




*Blanditia non imperio fit dulcis Venus (Latin): प्‍यार में मिठास आती है लुभावनेपन से न कि हुकूमतशाही से प्‍यूबिलियस साइरस F1. 1st Century BC
ग्‍यारहवाँ दिन
जनवरी २१,१९८२

धरती सूरज के चारों ओर घूमती है और अपनी अक्ष पर भी घूमती रहती है। पुल के नीचे से काफी पानी बह चुका है। वक्‍त हर चीज को बदल देता है, हर जिन्‍दगी को निगल जाता है। मैं नहीं जानता कि जिन्‍दगी कितनी उलझन भरी है। पिछली जुलाई में मैं पच्‍चीस साल का हो गया। जब मैंने अपनी पिछली जिन्‍दगी में झांक कर देखा तो वहाँ सिर्फ ‘‘एक शून्‍य’’ मिला। जिन्‍दगी की अकेली राह पर, मैं एक लड़की से प्‍यार कर बैठा। मगर अब उसने अपने माता-पिता की खातिर मुझे छोड दिया है। उम्‍मीद के बावजूद उम्‍मीद करता हूँ कि वह किसी दिन लौट आएगी। मैं उसका इंतजार कर रहा हूँ। अब तक उसका एक भी खत नहीं आया है। वह मुझे भूल गई होगी, हमारे रिश्‍ते को भूल गई होगी। क्‍या हमारा प्‍यार इतिहास में जमा हो गया है? ताज्‍जुब है, अब मुझे अहसास होने लगा कि अपने अपने दिलों की गहराईयों में हम सब अकेले हैं। अकेलापन हर इन्‍सान के लिये एक छुपे-शैतान की तरह है। हमें उसका सामना अकेले ही करना है। हाय, जिन्‍दगी!
अच्‍छा, अब, मैं वापस आज की डायरी पर आता हूँ और इस खयाल से छुटकारा पाने की कोशिश करता हूँ कि तुमने मुझे फिलहाल छोड़ दिया है या कभी नहीं छोड़ोगी।
सुबह, सब कुछ वैसा ही रहाः उठना, मॅुह-हाथ धोना नाश्‍ता करना, और, बस! 11.30 बजे मैं यूनिवर्सिटी की एके‍डेमिक ब्रांच गया सवाद के लिये प्राविजनल सर्टिफिकेट लेने, जिसके लिये मैंने दस दिन पहले दरखास्‍त दी थी। काऊन्‍टर पर लिखा था क्‍लोज्‍ड! मैंने इसकी ‘‘छोटी खिड़की’’ पर टक-टक की। एक आदमी ने उसे खोलकर पूछा कि मैं क्‍या चाहता हूँ। मैं मुस्‍कुराया और मैंने अत्‍यधिक नम्र होने की कोशिश की। मैंने उसे प्रोविजनल सर्टिफिकेट वाली रसीद दिखाई। उसे बड़ा गर्व महसूस हुआ, स्‍वयं को महत्‍वपूर्ण समझते हुए वह भी नरम पड़ गया। मैं उसकी खुशामद करने लगा। मुझे ऐसा लगा कि अगर किसी इंडियन से काम निकलवाना हो तो उसे हमेशा यह दिखाओ कि वह तुमसे श्रेष्‍ठ है। धन्‍यवाद, महात्‍मा गाँधी! उसने फौरन प्रोविजनल सर्टिफिकेट बना दिया। मैंने उसे बहुत बहुत धन्‍यवाद दिया और मैं काऊन्‍टर से चल पड़ा। कैम्‍पस में लोग भाग-दौड कर रहे थे।
कर्मचारियों की हड़ताल अभी भी जारी है। वाइस चान्‍सलर बिल्डिंग के पास वाला यूनिवर्सिटी गार्डन संघर्ष कर रहे कर्मचारियों से खचाखच भरा है। यूनियन के प्रेसिडेन्‍ट ने माईक पर कहा ‘‘कर्मचा‍री, जिन्‍दाबाद!’’ कर्मचारी छोटे-छोटे गुटों में बैठे थे। कुछ लोग मूँगफलियाँ फोड़ रहे थे, कुछ ताश खेल रहे थे, और कुछ अपने नेता का भड़काऊ भाषण ध्‍यान से सुन रहे थे। कुछ महिला कर्मचारी भी शामिल थी। वे अपने लीडर को सुनने के बजाय बुनाई कर रही थी। कितनी बेकार की हड़ताल है। बिल्‍कुल एकता नहीं है। मैंने गार्डन के चारों ओर घूम कर अपना अवलोकन खत्‍म किया और वापस होस्‍टल आ गया। मेरे निरीक्षण ने मुझे यह सुझाव दिया कि कर्मचारियों की हड़ताल का उद्देश्‍य हैः सुरक्षा की भावना, सामाजिक मान्‍यता और आर्थिक लाभ। वे कहाँ तक सफल होंगे? यह तो मैं तुम्‍हें नहीं बता सकता। मेरी नजर में, तो यह एक हर साल खेला जाने वाला गेम है, जिसमें कोई पुरस्‍कार नहीं है, बेकार की मेहनत!
मैं लंच के लिये होस्‍टल वापस आया और 4.30 बजे तक कमरे में ही बन्‍द रहा। ओने ने बताया कि वह तुम्‍हारा नहाने का कोट लाकर देगी, और मैं ग्‍वेयर हॉल पर उससे कोट ले लूँ। मैं वहाँ निश्चित समय पर पहुँचा (5.00 बजे) कमरे में हॉमसन, ओन, पू और उसका बच्‍चा बातें कर रहे थे। मैंने हैलो कहते हुए कोब (पू के बच्‍चे) का चुंबन लिया और ओने से कोट के बारे में पूछा। वह तो उसे लाना भूल गई थी! मुझे उसके साथ जाकर हॉस्‍टेल से कोट लेना पड़ा। मैंने उससे तुम्‍हारे पापा द्वारा तुम्‍हारे लिये भेजे गये खत के बारे में भी पूछा (ओने ने कल बताया था)। मुझे ऐसा करने के लिये (तुम्‍हारी इजाज़त के बिना) इस बात ने मजबूर किया कि मुझे तुम्‍हारे पापा की खैरियत की फिक्र है। माफ करना। एक बात और भी हैः मैं यह समझता हूँ कि अगर तुम्‍हारे पापा को कुछ हो गया, तो तुम मुझे खत नहीं लिखोगी। अब मैं निश्‍चिंत हूँ, क्‍योंकि मुझे मालूम है कि तुम्‍हारे पापा ठीक हो रहे हैं (उनके तुम्‍हारे लिये लिखे खत के मुताबिक)। पहली बार मैंने थाराटीकी लिखाई देखी। इतनी बढि़या है कि एक आठ साल का बच्‍चा ऐसे कर सकता है। मैं वाकई इस बात के लिये उनकी तारीफ करता हूँ।
मगर अब मुझे यह खयाल परेशान कर रहा है कि तुम्‍हारे पापा के काफी ठीक हो जाने के बाद भी तुम मुझे क्‍यों नहीं लिख रही हो। ऐसा महसूस होता है कि मेरा दिल रौंदा जा रहा है। यह खयाल मुझे पागल बना रहा है, मेरी जान। क्‍या तुम महसूस कर सकती हो? मुझे मालूम है कि तुम अपने पापा के और मेरे बीच में बंटी हुई हो। मैंने तुम्‍हारे पापा का खत पढा़। मैं पिता का प्‍यार, दुलार, चिन्‍ता और फिकर महसूस कर रहा हूँ जिसका काई मोल नहीं है।
पिता और पुत्री का संबंध इतना गहरा होता है कि उसे किसी भी तरह से तोडा नहीं जा सकता। तब मुझे महसूस होता है कि मैं तो कोई भी नहीं हूँ। यह सोचकर मैं काँप जाता हूँ कि अगर तुम्‍हारे पापा ने हमारे ‘‘जॉइन्‍ट एग्रीमेन्‍ट’’ को सम्‍मति न दी तो हमारा प्‍यार तो बरबाद हो जाएगा। जब वह घड़ी आएगी, तब मैं क्‍या करुँगा? यह सवाल वज्रपात की तरह दिमाग पर गिरा।
मैं, बेशक, तुम्‍हारी तारीफ ही करुँगा, अगर तुम अपने पापा को प्राथमिकता दो। ईमानदारी से कहूँ, तो मैं तुम्‍हारे और तुम्‍हारे पापा के लिये अपनी खुशी को भी ‘‘खत्‍म कर दॅूगा’’। मैं तुमसे वादा करता हूँ कि ‘‘हमारे’’ पापा हमारी हरकतों से आहत नहीं होंगे। आज ‘‘स्‍टेट्समेन’’ अखबार ने हमारे देश (थाईलैण्‍ड) के बारे में एक खबर प्रकाशित की है। यह छोटे कॉलम में है। खबर ऐसी हैः नसबन्‍दी मेराथॉन, बैंकोक, जन. 19। जन्‍म-नियन्‍त्रण प्रचारक मि० मिचाइ वीरावाइ दया ने कल बैंकोक की २००वीं वर्षगॉठ को इस वर्ष एक अनूठे प्रकार से मनाने की योजना की घोषणा की – एक नसबन्‍दी मेराथॉन का आयोजन करके, यह खबर ए०एफ०पी० ने दी है (कुछ अन्‍य अनावश्‍यक विवरण छोड़ रहा हूँ)।
यह खबर पढ़कर इस भयानक दुनिया से मुझे घृणा हो गई। यह धर्म के खिलाफ है! आर्थिक समस्‍याओं का बहाना देकर। ये सिर्फ नर-संहार का कार्यक्रम ही तो है। यह प्रदर्शित करती है वास्‍तविकता का सामना करने की मानव की असमर्थता, मानव की असफलता, मानव का अमानुषपन। आर्थिक संकट को हल करने में असमर्थ इन्‍सान मानव जाति को ही समाप्‍त करने चला है। अगर तुम मृत्‍य के पश्‍चात् की जिन्‍दगी में या ‘‘पुनर्जन्‍म’’ में विश्‍वास करती हो तो तुम इस घृणित योजना के प्रति मेरी असहमति और नफरत को समझ सकोगी। तुम्‍हारा पुनर्जन्‍म होगा कैसे यदि स्‍त्रियों और पुरूपों की नसबन्‍दी हो जाए तो?
अच्‍छे और बुरे कर्मों के परिणाम कहाँ हैं? इसकी सिर्फ निहिलिज्‍म (निषेधवाद) – वास्‍तविकता के निषेध से ही तुलना की जा सकती है। मैं इसे सभ्‍य समाज के शैतान द्वारा निर्मित एक निषेधात्‍मक कदम समझता हूँ। मैं, इस कलंकित कदम का विरोध करने वालों में सबसे आगे रहूँगा। इस ईश्‍वर विरोधी योजना का धिक्‍कार हो।


मैं अपना प्यार - 10



*Nondum amaban, et amare amabam…quaerebam quid amarem, amans amare (Latin): मैं प्‍यार करने नहीं लगा, मगर मुझे प्‍यार करने पर प्‍यार आता है, मैं इंतजार करता हूँ किसी के प्‍यार करने का, प्‍यार करने को प्‍यार करता हूँसे० अगस्‍टीन AD (354-430)
दसवाँ दिन
जनवरी २०,१९८२

मैं बहुत आहत हूँ, बुरी तरह आहत हूँ। अब तक तुम्‍हारी कोई खबर नहीं आई है। मैं परंशान हूँ। तुम्‍हें हुआ क्‍या है? क्‍या तुम इतनी व्‍यस्‍त हो कि मुझे एक लाईन भी नहीं लिख सकती? मैं चाहता हूँ कि तुम मेरी भावना को अपने दिल में रखो और उस पर विचार करों। अगर तुम मेरी जगह होतीं, तो तुम्‍हें पता चलता कि मैं भविष्‍य का सामना किस मुश्किल से कर रहा हूँ। मुझे बहुत तकलीफ होती है, मेरी जान। तुम एक नई चीज हो गई हो मेरी जिन्‍दगी में जिसके बिना मेरा काम नहीं चलता। क्‍या तुमने इस बारे में कभी सोचा है? तुम्‍हारे बिना जिन्‍दगी की कल्‍पना भी नहीं कर सकता। तुम्‍हारे बगैर तो मैं अपनी जिन्‍दगी की हर आकांक्षा को छोड़ दूँगा। याद रखो कि ‘‘एकता हमारी शक्ति है, विभाजन हमारी निर्बलता!’’
ठीक है, बहुत हो गया। मैं वापस अपनी दिल्‍ली की जिन्‍दगी पर आता हूँ।
आज कोई अखबार नहीं आया। यह कल की ऑल इंडिया हड़ताल का अप्रिय नतीजा है। धन्‍यवाद, भारतीय लोकतन्‍त्र! सुबह मैं काफी व्‍यस्‍त रहाः उठा, नहाया, नाश्‍ता किया, कपड़े धोए और उन्‍हें सुखाया। ये सारे उकताहट भरे काम करने के बाद मैं एक २० पृष्‍ठों का लेख फोटोकॉपी करवाने के लिये निकला।
जब मैं ग्वेयर हॉल के कैन्‍टीन तक पहुँचा, तो चू मेरी ओर साइकिल पर आ रहा था।
कहाँ? उसने पूछा
फोटोकॉपी करवाने,’’ मैंने जवाब दिया
उसने मुझसे अपनी साइकिल पर बैठने को कहा और फोटोकॉपी वाली दुकान तक ले जाने की इच्‍छा जाहिर की। मैं मान गया। जब हम वहाँ पहुँचे, तो बिजली नहीं थी। दुकानदार ने कहा कि मैं एक बजे आकर फोटोकॉपी ले जाऊँ। जब मैं उसकी साइकिल पर बैठ कर वापस आ रहा था तो मैंने सोचाः एक अच्‍छी सैर दूसरी का वादा करती है। मैंने उससे कहा कि साइकिल किंग्‍ज-वे कैम्‍प की ओर ले चले। जिससे हम लंच के लिये पोर्क खरीद सकें। किंग्‍ज-वे कैम्‍प के पास वाले ब्रिज पर हमें रेनू मिली जो अपनी टीचर बसन्‍ता से मिलने जा रही थी। उसने हमसे थाई तरीके से नमस्‍ते किया। मैंने उसे वुथिपोंग के कमरे पर लंच की दावत दी। उसने स्‍वीक़ति में सिर हिलाया। फिर हमने उससे बिदा ली। मैंने पोर्क के लिय १५रू० दिये हम वुथिपोंग के कमरे पर आए। हमने ‘‘चू’’ को अकेले पकाने के लिये छोड़ दिया और हम वुथिपोंग के क्‍लास से लौटने का इंतजार करने लगे। मैंने अपने हॉस्‍टल में झांका यह देखने के लिये कि कहीं तुम्‍हारी चिट्ठी तो नहीं आई है। (मुझे कितनी उम्‍मीद थी कि तुम्‍हारा खत आएगा)। मगर मुझे बडी निराशा हुई यह देखकर कि मेरे लिये कोई खत नहीं था। मैं इतना उदास हो गया, अपने आप को ढाढ़स बंधाने की भी ताकत नहीं रही। तुमने मुझे छोड दिया! तुमने मुझे फेंक दिया! अपनी निराशा से दूर भागने के लिये मैंने प्राचक को मेरे साथ पिंग-पाँग खेलने के लिये कहा। प्राचक ने अपने हॉस्‍टल में खाना खाया, मैंने वुथिपोंग, चू और ओने के साथ खाया। रेणु नहीं आई। हम उसे याद करते रहे मगर इस बारे में कुछ कर नहीं सके। मुझसे पूछना मत, प्‍लीज, कि लंच के समय मुझे तुम्‍हारी याद आई या नहीं, जा़हिर है कि जब हम बढि़या लंच करते हैं तो तुम्‍हारी याद आती ही है। यह तो मालूम ही है। समझाने की ज़रूरत नहीं है। ठीक है? लंच के बाद ओने और चू ग्‍वेयर हॉल गए टयूटोरियल्‍स के लिये। मैं और वुथिपोंग कमरे में ही रहे। किसी टूटे हुए दिल वाले के लिये खामोशी एक खतरनाक हथियार होता है। इस बात को ध्‍यान में रखते हुए मैंने उसके साथ बात-चीत शुरू कर दी। हमारी बात-चीत कुछ गपशप जैसी ही थी। हमेशा की तरह मैंने वुथिपोंग को उसके दिल का दर्द ऊँडेलने दिया और उसकी समस्‍या का कोई हल सोचने लगा। मैं पूरे ध्‍यान से उसकी बात सुन रहा था और उसकी जिन्‍दगी-या-मौत वाला मामला समझ रहा था। चू बीच में टपक पडा़, वह कोई चीज़ लेने आया था, जो वह भूल गया था। उसकी यह दखलन्‍दाजी सन्‍देहास्‍पद थी। वुथिपोंग ने अन्‍दाज लगाया कि उसने हमारी गपशप सुन ली है। मैंने इस ओर जरा भी ध्‍यान नहीं दिया, क्‍योंकि मेरे दिल में किसी के भी प्रति बुरी भावना नहीं थी। मैंने भी वुथिपोंग से कहा कि वह फिकर न करे। इसके बाद मैं उसे अपने साथ फोटोकॉपी की दुकान पर घसीट कर ले गया, और वहाँ से होस्‍टेल। सोम्‍मार्ट कमरे में नहीं था। उसकी प्रयून के साथ बूनल्‍यू के कमरे में रोज विशेष टयूशन होती है। हमने कुछ गाने सुने। वुथिपोंग नहाया और फिर कमरे से गया।
मैं कंबल में दुबक कर तीन घंटे सोया। यह नींद दिन भर की परेशानियों पर पर्दा डालने जैसी थी। जब मैं नींद में था तो किसी ने खिड़की पर टक-टक की, मैं अलसाया हुआ था, मैंने उठकर नहीं देखा कि यह कौन था। शाम को 5.30 बजे मैंने अपनी आँखें खोलीं, पहला ही ख़यालः क्‍या तुम्‍हारा खत आया है? मैंने दरवाजे के नीचे देखा। चौकीदार ने भीतर सरकाया होगा, मैंने सोचा। मगर उसका नामो निशान नहीं था। मुझे ऐसा लगा कि मेरी सारी शक्ति निकल गई है। निराशा से मैं अपनी छोटी-सी कॉट से उतरा और अकेलेपन तथा झल्‍लाहट से बचने के लिये कुछ न कुछ करता रहा –डिनर तक अपने आपको व्‍यस्‍त रखा।
चूंकि मैं डिनर पर देर से पहुँचा, इसलिये मुझे चावल नहीं मिला। मैंने तीन चपातियॉ और दाल खाई। सब्‍जी को हाथ भी नहीं लगाया। बस यही मेरा डिनर था। आज की डायरी के बाद लिख रहा हूँ। रात को मैं बस डायरी ही लिखता हूँ, कुछ और करने का मन ही नहीं होता।
मेरे ख़याल बस तुम्‍हारे ही इर्द-गिर्द घूमते हैं। अब, मैं डायरी लिखना बन्‍द कर रहा हूँ। मैं ‘‘सोच रहा हूँ ’’ कि नहा लूँ और कुछ देर तक कुछ बेकार की चीजें पढूँ, फिर सो जाऊँ। उम्‍मीद के बावजूद उम्‍मीद करता हूँ कि तुम जल्‍दी वापस आओगी।
दिल का तमाम प्‍यार!

मंगलवार, 22 मई 2018

मैं अपना प्यार - 09



*Quarebam quid Amarem (Latin): मुझे किसी की तलाश है प्‍यार करने के लिये। एनन 9th Century AD
नौंवा दिन
जनवरी १९,१९८२

आज देश व्यापी हड़ताल का दिन है सरकार द्वारा घोषित हड़ताल-विरोधी कानून के खिलाफ। यह कानून सभी प्रकार की हड़तालों को प्रतिबांधित करेगा और गवर्नर को यह अधिकार प्रदान करेगा कि जिससे राष्‍ट्रीय शांति के लिये खतरनाक या अहितकर व्‍यक्ति को अदालत में मुकदमा चलाए बिना गिरफ़तार किया जा सके। कर्मचारियोंके लिये पूरे दिन छुट्टी है। इस आखिल-भार‍तीय हड़ताल की योजना आठ ट्रेड-यूनियनों ने बनाई है, जिन्‍होंने एक अंतिम संयुक्‍त अपील जारी करके मजदूरों को आज काम बन्‍द करने के लिये कहा है। जिन ट्रेड-यूनियनों ने हड़ताल प्रायोजित की है उनमें ऑल इंडिया ट्रेड-यूनियन काँग्रेस (INTUC), सेन्‍टर ऑफ इंडियन ट्रेड-यूनियन (CITU) और भारतीय मजदूर संघ शामिल हैं। हड़ताल, जो सरकार की मज़दूर विरोधी नीतियों के खिलाफ है इन्‍टक द्वारा प्रस्‍तावित है और कई छोटी यूनियनों ने इसका समर्थन किया है। मगर रेलवे और टेलिग्राफ और आवश्‍यक सेवाओं को हड़ताल से बाहर रखा गया है; हड़ताल का मुख्‍य असर सार्वजनिक उपक्रमों और निजी उद्योगों पर पड़ेगा।
दिल्‍ली यूनिवर्सिटी ने कक्षाएँ निरस्‍त कर दी हैं। दिल्‍ली के प्रमुख बाज़ार बन्‍द रहेंगे। राज्‍य एवं केन्‍द्र सरकार ने शांति बनाए रखने और उद्योगों के चलते रहने के लिये कई उपाय किये हैं। आवश्‍यक सेवा केन्‍द्रों पर पुलिस वाले और सादे कपड़ो में पुलिसकर्मी तैनात हैं। भारत बन्‍द के दौरान कई असामाजिक तत्‍वों को गिरफ़तार किया गया है। दिल्‍ली में ४२ लोग गिरफ्तार किये गए हैं। यह खबर UNI ने दी हैं।
जा़हिर है, मैं आज कमरे में ही रहना पसन्‍द करुँगा, रेडियो सुनूंगा, किताबें पढॅूगा, मैगजिन्‍स छानूंगा - समय बिताने के लियें। ब्‍लैक कॉफी अभी भी मेरी अच्‍छी दोस्‍त है। कोशिश कर रहा हूँ कि रोजमर्रा की जिन्‍दगी मुझे बेहद बोर न कर दे। सुबह देर से नहाया। सोचो, ये तुम्‍हारी उम्‍मीद के कितना खिलाफ है कि मैं नहाऊँ। मगर मैंने ऐसा किया। तुम मेरे अच्‍छे व्‍यवहार से संतुष्‍ट हो? आज लंच नहीं मिला क्‍योंकि ऑल-इंडिया स्‍ट्राईक है।
मगर लंच-पैकेट बॅाट गये। 11 बजे से 6 बजे तक मुझे तुम्‍हारे खत का इंतजार था, मगर फिर से निराशा ही हाथ लगी। थाईलैण्‍ड जाकर तुम्‍हें एक हफ्ता हो गया...तुम्‍हारे बारे में बिना किसी खबर के। मेरे लिये यह बड़ी निराशाजनक बात है। तुम्‍हें क्‍या हो गया है? क्‍या तुम नहीं जानतीं कि तुम्‍हारे खत के लिये मैं मर रहा हूँ? क्‍या तुम मुझे भूल गई हो? क्‍या मैं इतनी आसानी से भुलाया जा सकता हूँ?
ये सारे ख़याल जबरन दिमाग में घुस आते हैं। लंच टाईम के बाद मैं अपने कमरे में गया और किताबो तथा रेडियो से दिल बहलाने की कोशिश की। पढ़ते-पढ़ते और सुनते-सुनते मेरी आँख लग गई। पाँच बजे मुकुल आया मुझे उठाने। हमने एक दूसरे को विश किया और अपने काम की प्रगति के बारे में बातें करने लगे, ऑल-इंडिया स्‍ट्राईक के बारे में भी बातें कीं। मुकुल एक सच्‍चा दोस्‍त है जो जरूरत के वक्‍़त काम आता है। जब भी मैं बेचैन होता हूँ, वह मेरी मदद के लिये आ जाता है। वह इस मान्‍यता में फिट नहीं बैठता कि ‘‘भारतीय स्‍वार्थी और शोषण करने वाले होते हैं।’’ उसने मुझसे पूछाः
‘‘तुम्‍हारी गर्ल-फ्रेन्‍ड कैसी है?’’
‘‘वह अच्‍छी है,’’ मैंने कहा, ‘‘धन्‍यवाद!’’
मैंने उसे नहीं बताया कि तुम थाईलैण्‍ड गई हो। मैंने इसे हमेशा गुप्‍त ही रखा। उसे इस बारे में शक भी नहीं हुआ। हम एक विषय से दूसरे विषय पर बातें करते रहेः पढ़ाई,धर्म,राजनीति इत्‍यादि। हम गहराई में नहीं गए क्‍योंकि हमें इन विषयों का पर्याप्‍त ज्ञान नहीं था। यह काम हमने विशेषज्ञों के लिये छोड़ दिया। मैंने उसके लिये ब्‍लैक कॉफी बनाई और, जाहिर है, मेरे लिए भी। फिर हम आराम से मिलने जुबिली एक्‍स्‍टेन्‍शन हॉल गये। वह वहाँ नहीं था क्‍योंकि वह हाल ही में नया राऊण्‍ड़ अबाउट (एजेन्‍ट) बना है, यानी वह व्‍यक्ति जो घूम-घूम कर लोगों से ऑर्डर लेता है और उन्‍हें सामान लाकर देता है। बेचारा! हम आगे CIE तक गये इस उम्‍मीद में कि वह वहाँ मिल जाए।
 हमे ताज्‍जुब हुआ यह देखकर कि वह अचान चुएन के कमरे में था। रेवरेण्‍ड चावारा और प्राचक भी वहाँ थें। एक ही किस्‍म के पंछी, जिन्‍हें एक दूसरे का साथ अच्‍छा लगता है। उनके लिये दोस्‍ती दुनिया की हर दौलत से ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण है। मैं शत-प्रतिशत सहमत हूँ। कुछ देर बाद हम हॉस्‍टेल के कॉमन रूम में पिंग-पाँग खेलने लाए। खेल से लम्‍बे समय तक दूर रहने के कारण मैं लगभग हर गेम हारता गया। आराम ने काफ़ी तरक्‍की कर ली है, आयान चुएन अपने पहले ही स्‍तर पर है, प्राचक और चावारा बस देख रहे थे।
मैं हॉस्‍टेल गया स्‍पेशल डिनर के लिये। सोम्‍मार्ट अभी तक वापस नहीं लौटा था। मैं नहाने की सोच रहा था, मगर ये सोचकर इरादा बदल दिया कि मैं डिनर के लिये लेट हो जाऊँगा। मैंने नहाने का कार्यक्रम कल तक के लिये स्‍थगित कर दिया। कभी मैं सोचता हूँ कि ‘‘टाल-मटोल करना समय की चोरी करने जैसा है,’’ कभी मैं ऐसा नहीं सोचता। उम्‍मीद है तुम इसके लिए मुझे माफ करोगी।
शाम को अपने प्‍यार की समस्‍याओं के बारे में बात करने वुथिपोंग मेरे पास नहीं आया, शायद प्‍यार ठंडा पड़ रहा है। मैं सोचता हूँ कि वह एक चिर निराश प्रेमी है। मुबारक हो! सोम्‍मार्ट अपनी पढा़ई के बारे में संजीदा है। रात को हम दोनों ने एक दूसरे से बहुत कम बातें कीं। वजह मामूली हैः हम एक दूसरे के मामलों में दखल नहीं देते। मुझे यह अच्‍छा लगता है। सबसे पहली चीज है पढा़ई - बाकी बातें बाद में। सम्रोंग हमारे पास नियमित रूप से आता है। प्राचक अंतर्मुख है। मुझे उसका अकेलापन अच्‍छा लगता है और मैं कभी उसकी जिन्‍दगी में दखल नहीं देता। उसे अपने एकान्‍त का आनन्‍द उठाने दो।
दिल्‍ली में जीवन आज सामान्‍य है। हालात आम तौर पर काबू में हैं। मौसम अभी भी ठण्‍डा है, कोहरा है, मगर हवाएँ नहीं चल रही हैं। चीजें और घटनाएँ तो आती जाती रहती हैं, मगर तुम मेरे दिल में हमेशा हो। तो ये आज के मेरे अंतिम शब्‍द हैं, क्‍योंकि आज की डायरी हम दोनों के बीच हौले से बन्‍द हो रही है। अलबिदा, खुश रहो ... ओह, चलते-चलते, मैं तुमसे प्‍यार करता हूँ!


मैं अपना प्यार - 08


*Credula res amor est (Latin): प्‍यार में हम हर चीज पर विश्‍वास कर लेते हैं Ovid 43 BC-AD C.17
आठवाँ दिन
जनवरी १८,१९८२

आज मैं ‘‘स्‍टेट्समेन’’ की हेडलाईन देखकर बुरी तरह चौंक गया, लिखा थाः ‘‘अमेरिका की स्‍नायु-गैस संग्रह करने के कदम पर चिंता।’’ आगे लिखा थाः
‘‘राजनयिक एवं सैन्‍य पर्यवेक्षक रीगन प्रशासन के स्‍नायु गैस को उत्‍पन्‍न करने तथा संग्रहित करने के तथाकथित फैसले से चिंतित हैं जिसे सोवियत संघ के साथ युध्‍द होने की स्थिति में इस्‍तेमाल किया जायेगा। सोवियत संघ के रासायनिक शस्‍त्रों के निर्माण के जवाब में अमेरिका स्‍नायु-गैस का निर्माण करेगा।’’
निःसंदेह, यह दोनों महाशक्तियों के बीच के ख़तरनाक संघर्ष की मिसाल है। मुझे दो शब्‍दों में निहित अर्थ से धक्‍का पहुँचा हैः स्‍नायु-गैस और रासायनिक शस्‍त्रास्‍त्र। मैं सोच भी नहीं सकता कि इनमें से किसी का भी क्‍या भयानक परिणाम होगा। मेरे विचार से, यदि ऐसा होता है तो इसका मतलब होगा पूरी दुनिया का विनाश, और मानव जाति का भी नाश। हमें घुटने टेक कर ईश्‍वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि दुनिया में इस तरह का विनाश न हो।
सुबह मैंने दो घंटे बढ़िया नींद ली। खास कुछ करने को था नहीं, इसलिये सो गया। वैसे स्‍वभाव से मैं आलसी नहीं हूँ। तुम तो जानती हो, है ना? मगर, आह, मैं पैदा भी थका हुआ था (मेरी माँ ने बताया था!)
मैं १२.०० बजे उठा। सबसे पहला काम – होस्‍टल के लेटर-बॉक्‍स में तुम्‍हारा खत देखना। मगर कोई फा़यदा नहीं हुआः अब तक तुम्‍हारा कोई खत नहीं आया। मैं बेचैन हो रहा हूँ, मेरी प्‍यारी! मैं बड़ी संजीदगी से तुम्‍हारी ओर से किसी खबर का इंतज़ा‌र करता रहा - जब से तुम गई हो तब से। मगर भगवान ने अब तक मेरी प्रार्थना नहीं सुनी। मैं मायूस हो गया। मैं कमरे मे वापस आया और बड़ी मायूसी से सूरते-हाल पर गौर करने लगा। प्‍यार मानसून की तरह हैः आता है, तेजी से बरसता है, फिर चला जाता है। ये बड़ी बुरी बात है, क्‍योंकि मैं ऐसा प्‍यार चाहता हूँ जो भरोसे के काबिल हो, जैसे कि सूर्यास्‍त। मैंने अपने आपको यह सोचकर समझाने की कोशिश की कि वक्‍त मेरे हर सवाल का जवाब देगा। निराशा के बादल छँट गए। बडा सुकून मिला!
मैंने हमेशा की तरह लंच-टाईम पर खाना खाया और एक घंटे तक अपने कमरे में गाने सुनता रहा। फिर मैं लाइब्रेरी गया और मैगजि़न-सेक्‍शन में दो घंटे बिताए। तीन दिनों से जो निबन्‍ध अधूरा पड़ा था वह पूरा किया। वही मोन्‍टेग्‍यू की व्‍याकरण में प्रत्‍याख्‍यान और स्‍वीक़ति। पीछा छूटा। मैं सेन्‍ट्रल लाइब्रेरी से बाहर आया और आर्टस फैकल्टी की लाइब्रेरी गया ‘‘Reading in English Tranformational Grammar (by Jacobs and Rosenbaum) (जैकब और रोजे़नबाम की ‘‘अंग्रेजी परिवर्तनीय व्‍याकरण पर निबंध’’) लेने। यह किताब मेरे शोध कार्य के लिये अत्‍यन्‍त महत्‍वपूर्ण है। मुझे कुछ परेशानी हुई क्‍योंकि मैं कैटलोग नंबर देखे बिना लाइब्रेरियन के पास चला गया। पहले तो उसने मेरी सहायता करने से इनकार कर दिया, इसलिये मैंने खुद ही उसे ढूँढ़ने की इजाजत माँगी। उसने इजाजत दे दी। मगर मेरा काम बना ही नहीं, क्‍योंकि मुझे उस जगह की आदत नहीं थी।
उसे मेरी दया आई। उसने कैटलोग नंबर ढुँढने में मेरी मदद की और आखिरकार वह किताब ढॅूढकर मुझे दे दी जिसकी मुझे इतनी जरूरत थी। मैंने उसे धन्‍यवाद कहा और संतुष्‍ट होकर लाइब्रेरी से निकला। आधे-अधूरे मन से मैं होस्टल लौटा (बचा हुआ आधा मन तुम्‍हारे साथ था)। वापस आते समय मुझे फुटपाथ पर मॅूगफली बेचने वाले की गरीबी का अहसास हुआ। इसलिये मैंने मूँगफली के बहुत छोटे पैकेट के लिये उसे एक रूपया दे दिया। जुबिली एक्‍सटेन्‍शन हॉल के पास मुझे रेव चावरा मिले। मैंने उन्‍हें मूँगफली पेश की। उन्‍होंने थोड़ी सी लीं हम जुदा हुए।
मैं 5.30 बजे होस्‍टल पहुँचा, १५ मिनट थोड़ा आराम किया और धुले हुए कपड़े इस्‍त्री करने के लिये धोबी के पास गया जो वुथिपोंग के कमरे में था। जब तक मेरा काम हो रहा था मैं वुथिपोंग से गप्‍पें लड़ाता रहा। डिनर के लिये वापस होस्‍टल आया। होस्‍टलर्स मेस के दरवाजे पर जमा हो गये थे, हरेक ‘‘पहले’’ घुसना चाहता था। मैं न तो पहला था, न ही आखिरी। मगर बेशक मैं पहले बैच में था! डिनर में मीट (मटन) था। इसलिये वे धक्‍का-मुक्‍की कर रहे थे। लानत है!
डायरी मैंने डिनर के बाद लिखी। अब मैं इसे खतम कर रहा हूँ। इसके बाद मैं थोड़ी देर पढूँगा और फिर तुम्‍हें गुड नाईट कहूँगा। अन्‍त में, मुझे विश्‍वास है किः प्‍यार आता-जाता रहता है, मगर एक प्‍यार करने वाला इन्‍सान कभी गर्मजोशी नहीं खोता। काश, मैं तुम्‍हें गुड नाईट चुंबन दे सकता। अलबिदा, मेरे प्‍यार। तुमसे फिर मिलूंगा। तुम्‍हारे प्रति अपने तमाम समर्पण और लगन के साथ।      

मैं अपना प्यार - 07


*Succesore novo vincitur omnis amor (Latin): नया प्‍यार हमेशा पुराने प्‍यार को हरा देता है Ovid 43 BC-AD C.17
सातवाँ दिन
जनवरी १७,१९८२

आज इतवार है। तुम्‍हारी बेहद याद आ रही है। हम साथ-साथ काम करते रहें है। मगर जिन्‍दगी की ज़रूरत ने, जो अचानक वज्रपात की तरह गिरी, हमें जुदा कर दिया। तुमने मुझे अकेला छोड़ दिया क्रूर भाग्‍य के थपेडे खाने के लिये! मेरे दिल में गम ने अपनी जगह बना ली है। हम, किसी न किसी रूप में, जिन्‍दगी के कैदी हैं। इतना मैं जानता हूँ। हर रोज मैं यही सोचकर अपने आप को दिलासा देता हूँ कि तुम कभी न कभी तो वापस आओगी। मैं अभी भी एक कैदी की तरह अपने प्‍यार के वापस लौटने का इंतजार करने की ड्यूटी निभा रहा हूँ।
आज सुबह मैं कुछ देर से उठा क्‍योंकि कल रात रोज़मर्रा के कामों में देर रात तक उलझा रहा। दस बजे मैं और सोम्‍मार्ट मुंशीराम बुक स्‍टोर गए, स्‍कूटर से। बदकिस्‍मती से वह बन्‍द था। वजह सिर्फ ये थी कि यह एक छुट्टी! का दिन था। हम आगे कनाट प्‍लेस तक किसी काम से चले गए। इतवार के दिन कनाट प्‍लेस कब्रिस्‍तान की तरह दिखाई देता है। करीब-करीब सारी दुकानें बन्‍द थीं। कुछ विदेशी टूरिस्‍ट्स कॉरीडोर्स में, फुटपाथों पर और सड़कों पर चल रहे थे। सड़क पर गाडियाँ लगातार आ-जा रही थी। ट्रैफिक सुचारू रूप से चल रहा था।
पालिका प्‍लाजा़ बन्‍द था। सिर्फ रेस्‍तराँ और थियेटर्स खुले थे। घूमने निकलने से पहले हमने हेस्‍टी-टेस्‍टी रेस्‍तरॉ में सस्‍ता-सा लंच लिया। फिर हम एक गोलाकार पथ पर एक जगह से दूसरी जगह चलते रहे। हमने शुरूआत की हेस्‍टी–टेस्‍टी से पालिका प्‍लाजा़ तक, जनपथ, फिर क्‍वालिटी रेस्‍तराँ के सामने रीगल तक। हमने ज्‍यादातर समय सड़क पर लगी दुकानों में सस्‍ते कपडों और किताबों को देखने में बिताया। साड़ी पहनी सुन्‍दर, जवान लड़कियों को देखना अच्‍छा लग रहा था।
वे रेगिस्‍तान में किसी नखलिस्‍तान की तरह मालूम होती थी। एक दिलचस्‍प बात यह हुई कि जब हम क्‍वालिटी रेस्‍तराँ के सामने किताबें छान रहे थे तो हमें एक अजीब सा आदमी मिला। सोम्‍मार्ट ने जन्‍म-कुण्‍डली पर एक किताब उठाई और उसका कवर देखने लगा। वह अजीब आदमी उसकी तरफ आया और पूछने लगा,
‘‘क्‍या तुम बौद्ध हो?’’
‘‘हाँ’’ सोम्‍मार्ट ने ताज्‍जुब से कहा। आदमी ने आगे पूछा, ‘‘क्‍या तुम जन्‍म–पत्री में विश्‍वास करते हो?’’
सोम्‍मार्ट जवाब देने से हिचकिचा रहा था। मैं परिस्थिति समझ रहा था और मुझे डर था कि सोम्‍मार्ट कहीं उसके जाल में न फँस जाए, मैं बोल पड़ा,
‘‘ये बस व्‍यक्तिगत दिलचस्‍पी है।’’
उसने यूँ सिर हिलाया, जैसे इस बात को जानता है। फिर उसने किताब की कीमत पूछी और सोम्‍मार्ट के लिये उसे खरीद लिया। सोम्‍मार्ट इस प्रतिक्रिया से कुछ चौंक गया। उसे समझना मेरे बस के बाहर की बात थी। उसने एक-तरफा बात-चीत शुरू कर दी, स्‍वगत भाषण, धर्मों पर और आध्‍यात्मिकता पर। हम उसकी बातों पर पूरा ध्‍यान दे रहे थे, सिर्फ इसलिये कि उसका मन पढ़ सकें और यह पता कर सकें कि वह किस तरह का आदमी है। उसके हुलिए और उसकी बातों के आधार पर मैं उसे कोई धार्मिक कट्टरपंथी कहूँगा।
उसका मुख्‍य उद्धेश्‍य था धर्म के प्रति उसके अपने मूल्‍यांकन को लोगों में फैलाना। इस लिये, मेरे दिमाग पर कोई प्रभाव नहीं पडा़। मैं तो इसे एक आकास्मिक आश्‍चर्य कहूँगा, बस, और कुछ नहीं।
हम १०४ नंबर की बस पकड़ कर होस्‍टल की ओर चले। जब हम दरियागंज पहुँचे (लाल किले के निकट), तो हमने अपना इरादा बदल दिया और वहाँ फुटपाथ पर लगी ढेर सारी पुस्‍तकों की प्रदर्शनियों के लिये वहाँ उतर पड़े। ज्‍यादातर किताबें बेकार की थीं, फटी हुई और गन्‍दी। अपने लालच को रोक न पाने से मैंने दो किताबें खरीद ही ली १२० रू० में।
हम वहाँ से हटे, कुछ आगे चले लाल किले की ओर कपडे देखने के लिए जिनकी ढेर सारी किस्‍में वहाँ रखी थीः कोट, ओवर-कोट, स्‍वेटर और भी न जाने क्‍या-कया। उन्‍हें देखते-देखते थककर हमने वापस जाकर लाल किले वाले बस-स्‍टॉप से बस पकड़ने का निश्‍चय किया, वहाँ हमें फागा मिली जो थाई लोगों की चर्चा का केन्‍द्र थी। वह अपने फलैट पर जा रही थी। हमने भी वही बस पकड़ी और मॉल-रोड तक हम साथ ही रहे। वह शेखी मार रही थी, जैसे वह अपनी किस्‍म की एक ही थी। ये भी एक चौंकाने वाला संयोग था।
आज रात मेरे होस्‍टल में खाना नहीं था इसलिए मुझे और सोम्‍मार्ट को खाने के लिये कहीं और जाना पडा। हमने ग्‍वेयर हॉल में खाना खाया। खाना एकदम बेस्‍वाद थाः दाल, सब्‍जी और चावल – हमेशा ही की तरह। मैं नहीं कह सकता कि आज का दिन उल्‍लेखनीय था।
मैं थक गया था, मेरी जान, मैं जल्‍दी सोना चाहता था। अगर सलामत रहा तो तुमसे मिलूँगा। मैं तुमसे सपने में मिलूँगा। शुभ रात्रि, मेरे प्‍यार।











मैं अपना प्यार for Kindle

  अपना प्यार मैं दिल्ली में छोड़ आया   एक थाई नौजवान की ३० दिन की डायरी जो विदेश में बुरी तरह प्‍यार में पागल था                ...